ऐसे तड़प-तड़प कर मरा था भारत को बेहिसाब लूटने वाला महमूद ग़ज़नवी

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महमूद ग़ज़नवी के बारे में तो आपने सुना ही होगा । महमूद ग़ज़नवी मध्य अफ़ग़ानिस्तान में केन्द्रित गज़नवी वंश का एक महत्वपूर्ण शासक था जो पूर्वी ईरान भूमि में साम्राज्य विस्तार के लिए जाना जाता है। वह तुर्क मूल का था और अपने समकालीन (और बाद के) सल्जूक़ तुर्कों की तरह पूर्व में एक सुन्नी इस्लामी साम्राज्य बनाने में सफल हुआ। उसके द्वारा जीते गए प्रदेशों में आज का पूर्वी ईरान, अफगानिस्तान और संलग्न मध्य-एशिया (सम्मिलिलित रूप से ख़ोरासान), पाकिस्तान और उत्तर-पश्चिम भारत शामिल थे। लेकिन क्या आप जानते हैं इस क्रूर आक्रमणकारी की मृत्यु कैसे और कब हुई? आज हम आपको बताते हैं इस तुर्क शासक के बारे में और भारत में इसके द्वारा किए गए आक्रमणों के बारे में।

कौन था महमूद ग़ज़नवी

महमूद ग़ज़नवी यमीनी वंश का तुर्क सरदार ग़ज़नी के शासक सुबुक्तगीन का पुत्र था। उसका जन्म ई. 971 में हुआ, 27 वर्ष की आयु में ई. 998 में वह शासनाध्यक्ष बना था। महमूद बचपन से भारतवर्ष की अपार समृद्धि और धन-दौलत के विषय में सुनता रहा था। महमूद भारत की दौलत को लूटकर मालामाल होने के स्वप्न देखा करता था। उसने 17 बार भारत पर आक्रमण किया और यहां की अपार सम्पत्ति को वह लूट कर ग़ज़नी ले गया था। आक्रमणों का यह सिलसिला 1001 ई. से आरंभ हुआ।

हिन्दूशाहियों के विरुद्ध अभियान

दरअसल महमूद बचपन से भारतवर्ष की अपार समृद्धि और धन-दौलत के विषय में सुनता रहा था। इसलिए महमूद ने सिंहासन पर बैठते ही हिन्दूशाहियों के विरुद्ध अभियान छेड़ दिया। महमूद ने पहला आक्रमण हिन्दू शाही राजा ‘जयपाल'(जयपाल ओहिन्द (उद्भांडपुर) के हिन्दुशाही वंश का राजा था, जिसका राज्य कांगड़ा से लेकर अफ़ग़ानिस्तान तक फैला हुआ था) के विरुद्ध 29 नवंबर सन् 1001 में किया।

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मुसलमान शासकों ने दिया जयपाल का साथ

आपको बता दें कि उनके बीच होने वाले संघर्ष में मुल्तान के मुसलमान शासकों ने ‘जयपाल’ का साथ दिया। उन दोनों में भीषण युद्ध हुआ परन्तु महमूद की जोशीली और बड़ी सेना ने जयपाल को हरा दिया। इस अपमान से व्यथित होकर वह जीते जी चिता पर बैठ गया और उसने अपने जीवन का अंत कर दिया। जयपाल के पुत्र आनन्दपाल और उसके वंशज ‘त्रिलोचनपाल’ तथा ‘भीमपाल’ ने कई बार महमूद से युद्ध किया।

सुल्तान महमूद का मथुरा आक्रमण

महमूद इतना विध्वंसकारी शासक था कि लोग उसे मूर्तिभंजक कहने लगे थे। ग्यारवीं सदी के आरम्भ में उत्तर-पश्चिम की ओर से मुसलमानों के धावे भारत की ओर होने लगे। महमूद ने सत्रह बार भारत पर चढ़ाई की। उसका उद्देश्य लूटपाट करके ग़ज़नी लौटना होता था। अपने नवें आक्रमण का निशाना उसने मथुरा को बनाया। उसका वह आक्रमण 1017 ई. में हुआ। मथुरा को लूटने से पहले महमूद गज़नवी को यहां एक भीषण युद्ध करना पड़ा। यह युद्ध मथुरा के समीप महावन के शासक कुलचंद के साथ हुआ।

महावन के दुर्ग पर आक्रमण

अपने लूटमार के सिलसिले में आगे बढ़ते हुए मेरठ आकर सुलतान ने महावन के दुर्ग पर आक्रमण किया था। महावन के शासक कुलचंद्र से उसका सामना हुआ। उस युद्ध में अधिकांश हिन्दू सैनिक यमुना नदी में धकेल दिये गए थे। राजा ने निराश होकर अपने स्त्री-बच्चों का स्वयं वध किया और फिर ख़ुद को भी मार डाला। दुर्ग पर मुसलमानों का अधिकार हो गया। महावन की लूट में उसे प्रचुर धन-सम्पत्ति तथा 185 हाथी मिले थे।’ महमूद के मीरमुंशी अल-उत्वी ने अपनी पुस्तक ‘तारीखे यामिनी’ में इस आक्रमण का वर्णन किया है।

सोमनाथ के मंदिर का ध्वंस

महमूद का सबसे बड़ा आक्रमण 1026 ई. में काठियावाड़ के सोमनाथ मंदिर पर था। देश की पश्चिमी सीमा पर प्राचीन कुशस्थली और वर्तमान सौराष्ट्र (गुजरात) के काठियावाड़ में सागर तट पर सोमनाथ महादेव का प्राचीन मंदिर है। स्कंद पुराण में इसका उल्लेख मिलता है। चालुक्य वंश का भीम प्रथम उस समय काठियावाड़ का शासक था। महमूद के आक्रमण की सूचना मिलते ही वह भाग खड़ा हुआ।

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सोमनाथ मंदिर का शिवलिंग तोड़ डाला

विध्वंसकारी महमूद ने सोमनाथ मंदिर का शिवलिंग तोड़ डाला। मंदिर को ध्वस्त किया। हज़ारों पुजारी मौत के घाट उतार दिए और वह मंदिर का सोना और भारी ख़ज़ाना लूटकर ले गया। अकेले सोमनाथ से उसे अब तक की सभी लूटों से अधिक धन मिला था। उसका अंतिम आक्रमण 1027 ई. में हुआ। उसने पंजाब को अपने राज्य में मिला लिया था और लाहौर का नाम बदलकर महमूदपुर कर दिया था। महमूद के इन आक्रमणों से भारत के राजवंश दुर्बल हो गए और बाद के वर्षों में मुस्लिम आक्रमणों के लिए यहां का द्वार खुल गया।

अंतिम काल में महमूद गज़नवी

अपने अंतिम काल में महमूद गज़नवी असाध्य रोगों से पीड़ित होकर असहनीय कष्ट पाता रहा था। अपने दुष्कर्मों को याद कर उसे घोर मानसिक क्लेश था। वह शारीरिक एवं मानसिक कष्टों से ग्रसित था। उसकी मृत्यु सन 1030, अप्रैल 30 ग़ज़नी में मलेरिया के कारण हुई।

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