आइए जानते हैं नादिरशाह की जिल्लत भरी मौत की कहानी

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नादिरशाह के बारे में तो आपने सुना ही होगा जिसके आक्रमण और लूटमार के काले कारनामों से तत्कालीन ऐतिहासिक ग्रंथों के पन्ने भरे हुए हैं। नादिरशाह जिसे ‘नादिर कोली बेग़’ के नाम से भी जाना जाता है फ़ारस का शाह था। उसे ‘ईरान का नेपोलियन’ भी कहा जाता है। उसने सदियों के बाद ईरानी प्रभुता स्थापित की थी। उसने अपना जीवन दासता से आरंभ किया था और फ़ारस का शाह बना। उस समय के ईरानी साम्राज्य के ताकतवर शत्रु ‘उस्मानी’ साम्राज्य और ‘रूसी’ साम्राज्य को ईरानी क्षेत्रों से बाहर निकाला। वो भारत विजय के अभियान पर भी निकला था…और भारत को तहस-नहस करते हुए बेहिसाब लूटा। आइए जानते हैं नादिरशाह के जीवन, भारत में लुटमार और जिल्लत भरी मृत्यु की कहानी….

कौन था नादिरशाह?

नादिर का जन्म 1688 में खोरासान (उत्तर पूर्वी ईरान) में अफ़्शार क़ज़लबस कबीले में एक साधारण परिवार में हुआ था। उसके पिता एक साधारण किसान थे जिनकी मृत्यु नादिर के बाल्यकाल में ही हो गई थी। नादिर के बारे में कहा जाता है कि उसकी मां को उसके साथ उज़्बेकों ने दास (ग़ुलाम) बना लिया था। पर नादिर भागने में सफल रहा और वो एक अफ़्शार कबीले में शामिल हो गया और कुछ ही दिनों में उसके एक तबके का प्रमुख बन बैठा। जल्द ही वो एक सफल सैनिक के रूप में उभरा और उसने एक स्थानीय प्रधान बाबा अली बेग़ की दो बेटियों से शादी कर ली।

नादिरशाह का भारत पर आक्रमण

Nadirshah

तत्कालीन भारत के बादशाह मुहम्मदशाह के शासन काल की एक अत्यंत दुखान्त घटना भारत पर नादिरशाह का आक्रमण करना था। मुग़ल शासन के आरंभ से ही किसी बाहरी शत्रु का भारत पर आक्रमण नहीं हुआ था किंतु उस काल में दिल्ली की शासन−सत्ता इतनी दुर्बल हो गई थी कि ईरान के एक महत्त्वाकांक्षी लुटेरे शासक नादिरशाह ने भारत पर आक्रमण करने का साहस किया था।

मुहम्मदशाह और नादिरशाह के मध्य युद्ध

मुग़ल बादशाह मुहम्मदशाह और नादिरशाह के मध्य करनाल का युद्ध 24 फ़रवरी 1739 ई. में लड़ा गया। इस लड़ाई में नादिरशाह की विजय हुई और मुग़ल सम्राट् द्वारा शासित काबुल−कंधार प्रदेश पर अधिकार करके पेशावर स्थित मुग़ल सेना का विध्वंस कर डाला गया।

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जब मुहम्मदशाह को नादिरशाह के आक्रमण की बात बतलाई गई तो उसने उसे हंसी में उड़ा दिया। उसकी आंखें तब खुलीं जब नादिरशाह की सेना पंजाब को रौंधती हुई करनाल तक आ पहुंची थी। मुहम्मदशाह ने अपनी सेना उसके विरुद्ध भेजी लेकिन 24 फरवरी, 1739 में उसकी पराजय हो गई। नादिरशाह ने पहले 2 करोड़ रुपया हर्जाना देने की मांग की थी, किंतु उसके स्वीकार होने पर वह 20 करोड़ मांगने लगा।नादिरशाह ने की हर्जाने की मांग

दिल्ली में लूटपाट

नादिरशाह का भारत पर आक्रमण

मुग़लों का कारू का-सा खज़ाना भी उस काल में ख़ाली हो गया था, अत: 20 करोड़ कैसे दिया जा सकता था। इसलिए नादिरशाह ने दिल्ली को लूटने और वहां नर संहार करने की आज्ञा प्रदान कर दी। उसके बर्बर सैनिक राजधानी में घुस पड़े और उन्होंने लूटमार का बाज़ार गर्म कर दिया। उसके कारण दिल्ली के हज़ारों नागरिक मारे गये और वहां भारी लूट की गई।

नादिरशाह को मिली बेशुमार दौलत

इस लूट में नादिरशाह को बेशुमार दौलत मिली थी। उसे 20 करोड़ की बजाय 30 करोड़ रुपया नक़द मिला। उसके अतिरिक्त ढ़ेरों जवाहरात, बेगमों के बहुमूल्य आभूषण, सोने-चांदी के अनगणित वर्तमान तथा अन्य बेश-कीमती वस्तुएं उसे मिली थीं। इनके साथ ही साथ दिल्ली की लूट में उसे कोहिनूर हीरा और शाहजहां का ‘तख्त-ए-ताऊस’ (मयूर सिंहासन) भी मिला था।

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दो महीने तक दिल्ली में लूटमार

नादिरशाह के हाथ पड़ने वाली शाही हरम की सुंदरी बेगमों के अतिरिक्त मुहम्मदशाह की पुत्री ‘शहनाज बानू’ भी थी, जिसका विवाह उसने अपने पुत्र ‘नसरूल्ला ख़ां’ के साथ कर दिया। नादिरशाह दो महीने तक दिल्ली में लूटमार करता रहा था। उसके कारण मुग़लों की राजधानी उजाड़ और बर्बाद-सी हो गई थी। जब वह यहां से जाने लगा तब करोड़ों की संपदा के साथ ही साथ वह 1,000 हाथी, 7,000 घोड़े, 10,000 ऊंट, 100 खोजे, 130 लेखक, 200 संगतराश, 100 राज और 200 बढ़ई भी अपने साथ ले गया था।

 

अपार सम्पत्ति अर्जित की

नादिरशाह का भारत पर आक्रमण

दिल्ली की सत्ता पर आसीन मुग़ल बादशाह मुहम्मदशाह को हराने के बाद उसने वहां से अपार सम्पत्ति अर्जित की, इसके बाद वह शक्तिशाली बन गया लेकिन इसके कुछ समय बाद ही उसका स्वास्थ्य भी बिगड़ता गया। अपने जीवन के उत्तरार्ध में वह बहुत अत्याचारी बन गया था। सन् 1747 में उसकी हत्या के बाद उसका साम्राज्य जल्द ही तितर-बितर हो गया।

ऐसे हुई इस आक्रमणकारी की मृत्यु

ईरान पहुंचकर उसने ‘तख्त-ए-ताऊस’ पर बैठ कर बड़ा शानदार दरबार बनाया। भारत की अपार सम्पदा को भोगने के लिए वह अधिक काल तक जीवित नहीं रहा था। उसके सैनिकों ने विद्रोह कर दिया, जिसमें वह मारा गया। आखिर में इस आक्रमणकारी को इसी के लोगों ने मार डाला। बता दें नादिरशाह की मृत्यु संवत 1804 (1747) में हुई थी।

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