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मात्र एक क्षण ने तय की सामूगढ़ युद्ध में दारा की पराजय

मुग़ल साम्राज्य,गुजरात का इतिहास,शाहजहाँ का इतिहास
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Written by Afsaana Team

दारा शिकोह की 60 हज़ार की सेना औरंगज़ेब की सेना से बड़ी थी, लेकिन औरंगज़ेब अधिक अनुभवी था।

दारा शिकोह को मुग़ल साम्राज्य के इतिहास का भूला बिसरा बादशाह भी कहा जाता है। शाहजहाँ के बीमार पड़ने पर औरंगजेब और मुराद ने दारा के धर्मद्रोही होने का नारा लगाया। युद्ध हुआ। दारा दो बार, पहले आगरे के निकट सामूगढ़ में (जून, 1658) फिर अजमेर के निकट देवराई में (मार्च, 1659), पराजित हुआ। अंत में 10 सितंबर 1659 को दिल्ली में औरंगजेब ने उसकी हत्या करवा दी, लेकिन इनमें खास था सामूगढ़ का युद्ध…

सामूगढ़ का यह युद्ध उत्तर भारत की भीषण गर्मी में हुआ और इसका निर्णय महत्त्वपूर्ण क्षणों में दारा शिकोह द्वारा अपने हाथी से नीचे उतर जाने के कारण हुआ। सामूगढ़ का युद्ध 29 मई, 1658 ई. को मुग़ल बादशाह शाहजहाँ के पुत्रों, दारा शिकोह और औरंगज़ेब तथा मुराद बख़्श की संयुक्त सेनाओं के मध्य लड़ा गया था।

सामूगढ़ मैदान

मुग़ल बादशाह शाहजहाँ के गम्भीर रूप से बीमार पड़ने के बाद उसके पुत्रों के बीच सिंहासन के लिए उत्तराधिकार का युद्ध प्रारम्भ हो गया। युद्ध के लिय दोनों ओर की सेनाएँ सामूगढ़ के मैदान में आकर डट गईं। इस युद्ध में एक ओर बादशाह का बड़ा पुत्र दारा शिकोह था, जो कि सम्भावित उत्तराधिकारी था तथा दूसरी ओर औरंगज़ेब व मुराद बख़्श थे।

दारा शिकोह सामूगढ़ की ओर मुड़ा

औरंगज़ेब को एक आरक्षित दुर्ग मिलने के बाद चम्बल नदी पर हो रहे युद्ध की दिशा बदल गई और दारा शिकोह सामूगढ़ की ओर मुड़ा, जो आगरा के पूर्व में (शाहजहाँ निवास) 16 किलोमीटर दूर यमुना नदी के दक्षिण में स्थित था। दारा शिकोह की 60 हज़ार की सेना औरंगज़ेब की सेना से बड़ी थी, लेकिन औरंगज़ेब अधिक अनुभवी था।

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दारा की पराजय

दारा की फ़ौज ने अपने स्वामी को हाथी की पीठ पर न पाकर उसे मरा हुआ समझा लिया और सारी फ़ौज में भगदड़ मच गई।
दारा आगरा की ओर भाग निकला। निराशा से भरा दारा अपने पड़ाव और बन्दूकों को अपने शत्रुओं के द्वारा अधिकृत किये जाने के लिए छोड़कर आगरा की ओर भाग निकला। इस निर्णायक युद्ध में दारा की पराजय हुई। इस प्रकार सामूगढ़ की लड़ाई ने शाहजहाँ के पुत्रों के बीच उत्तराधिकार के युद्ध का निर्णय कर दिया।

दारा को 1633 में युवराज बनाया गया और उसे उच्च मंसब प्रदान किया गया। 1645 में इलाहाबाद, 1647 में लाहौर और 1649 में वह गुजरात का शासक (गवर्नर) बना। 1653 में कंधार में हुई पराजय से इसकी प्रतिष्ठा को धक्का पहुँचा। फिर भी शाहजहाँ इसे अपने उत्तराधिकारी के रूप में देखता था, जो दारा के अन्य भाइयों को स्वीकार नहीं था।

दारा की हत्या

दारा की अपने पिता की गद्दी को प्राप्त करने की समस्त आशाएँ धूल में मिल गयीं। युद्धोपरान्त औरंगज़ेब ने अपने भाई मुराद बख़्श और शाहजहाँ को क़ैद कर लिया और 8 जून 1658 को आगरा पर उसने अधिकार कर लिया, जबकि लम्बी अवधि तक पीछा करने और दूसरी बार 12 से 14 अप्रैल, 1659 ई. में ‘देवरई की लड़ाई’ हार जाने के बाद दारा शिकोह का वध कर दिया गया।

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