अंग्रेजो को कचरे की तरह कैदखाने में भर दिया था नवाब सिराजुद्दौला ने

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भारतियों पर अंग्रेजो के जुल्म की कहानिया तो सभी ने सुनी होगी लेकिन, भारतीय इतिहास की एक ऐसी प्रमुख घटना जिसने अंग्रेजो को हिला कर रख दिया, ये घटना घटी कलकत्ता।

ये बात है 20 जून, 1756 ई. की जब बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला ने कलकत्ता पर क़ब्ज़ा कर लिया। नगर में रह्ने वाले अधिकांश अंग्रेज़ नवाब से हारने के कारण जहाज़ों द्वारा नदी के रास्ते भाग चुके थे और जो थोड़े से भागने में असफल रहे, वे बन्दी बनाकर कैद कर लिये गये। उन्हें क़िले के भीतर ही एक कोठरी में रखा गया था, जो ‘कालकोठरी’ (BlackHole) नाम से विख्यात है…

काल कोठरी काण्ड की घटना

‘काल कोठरी’ आजादी से पहले की पश्चिम बंगाल की एक घटना है। ऐसा माना जाता है कि, बंगाल के नवाब (सिराजुद्दौला) ने 146 अंग्रेज बंदियों, जिनमें स्त्रियाँ और बच्चे भी सम्मिलित थे, को एक 18 फुट लंबे, 14 फुट 10 इंच चौड़े कमरे में बन्द कर दिया था। 20 जून, 1756 ई. की रात को बंद करने के बाद, जब 23 जून को प्रातः कोठरी को खोला गया तो, उसमें 23 लोग ही जीवित पाये गये।

नवाब द्वारा कलकत्ता पर आक्रमण करने का कारण

घटना भारत में एक सनसनीखेज मुक़दमा और विवाद का विषय बनी। नवाब ने कलकत्ता पर इसलिए आक्रमण किया, क्योंकि कंपनी ने सात वर्षीय युद्ध 1756-1763 ई. की आशंका में अपने प्रतिद्वंद्वों से सुरक्षा हेतु नगर की क़िलेबंदी का काम नवाब के कहने के बावजूद नहीं रोका।

काल कोठरी घटना के रचियता

इसकी रचना में एक ऐसा व्यक्ति भी शामिल था जो इस घटना का शिकार हुआ । उस व्यक्ति का नाम हाल्वेल था ,इन्हें ही काल कोठरी की घटना का रचियता माना जाता है । ‘हालवैल’ ऐसे व्यक्तियो में शामिल था जो जिन्दा बचे।

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अंग्रेजो में भर दी बदले की भावना

इतिहास में इस घटना का महत्व केवल इतना ही है कि अंग्रेज़ों ने इस घटना को आगे के आक्रामक युद्ध का कारण बनाये रखा। जे.एच.लिटिल (आधुनिक इतिहासकार) के अनुसार “हालवैल तथा उसके सहयोगियों ने इस झूठी घटना का अनुमोदन किया था और इस मनगढ़न्त कथा को रचने का षड्यन्त्र किया था।”

कौन था हालवैल

हालवैल कलकत्ता का एक सैनिक अधिकारी था जिसको कलकत्ता का तत्कालीन गवर्नर ‘डेक’ सिराजुद्दौला से भयभीत होकर कलकत्ता का उत्तरदायित्व सौपकर भाग गया था।

बदला लेने के लिए अंग्रेजो ने की युद्ध की घोषणा

इस प्रकार इस कांड को कलकत्ता का पतन ‘प्लासी युद्ध’ का मुख्य कारण माना जाता है। अंग्रेज अधिकारियों ने मद्रास से अपनी उस सेना को रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में कलकत्ता भेजा, जिसका गठन फ़्राँसीसियों से मुकाबलें के लिए किया गया था। इस सैन्य अभियान में ‘एडमिरल वाट्सन’, क्लाइव का सहायक था।

नवाब के ख़िलाफ़ युद्ध का ऐलान

अंग्रज़ों द्वारा 2 जनवरी, 1757 ई. को कलकत्ता पर अधिकार करने के बाद उन्होंने नवाब के ख़िलाफ़ युद्ध की घोषण कर दी। परिणास्वरूप नवाब को क्लाइव के साथ 9 जनवरी, 1757 ई. को अलीनगर की सन्धि करनी पड़ी। सन्धि के अनुसार नवाब ने अंग्रेज़ों को वह अधिकार पुनः प्रदान किया, जो उन्हें सम्राट फ़र्रुख़सियर के फ़रमान द्वारा मिला हुआ था, और इसके साथ ही तीन लाख रुपये क्षतिपूर्ति के रूप में दिए।

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क्लाइव और नवाब

अब रॉबर्ट क्लाइव ने कूटनीति के सहारे नवाब के उन अधिकारियों को अपनी ओर मिलाना चाहा, जो नवाब से असंतुष्ठ थे। अपनी इस योजना के अन्तर्गत क्लाइव ने सेनापति मीर ज़ाफ़र, साहूकार जगत सेठ, मानिक चन्द्र, कलकत्ता का व्यापारी राय दुलर्भ तथा अमीन चन्द्र से एक षडयंत्र कर सिराजुद्दौला को हटाने का प्रयत्न किया। इसी बीच मार्च, 1757 ई. में अंग्रज़ों ने फ़्राँसीसियों से चन्द्रनगर के जीत लिया। अंग्रेज़ों के इन समस्त कृत्यों से नवाब का क्रोध सीमा से बाहर हो गया, जिसकी अन्तिम परिणति ‘प्लासी के युद्ध’ के रूप में हुई।

विश्लेषण

यह घटना घटी अवश्य, लेकिन आज भी सचाई सामने नही आयी है, क्योंकि इस बात का अंदाजा आज भी नही लगा पाए कि आखिर, क्या सच में इतने छोटे से कैदखाने में इतने लोगो को एक साथ भर दिया ,लेकिन कहा जाता है कि काल कोठरी में बंदियों की संख्या लगभग 64 थी, जिनमें से 21 ही जीवित बचे थे।

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