जब रानी पद्मावती को गंवानी पड़ी थी अपनी जान

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इतिहास में घटी बहुत सी कहानियां तो आपने सुनी ही होंगी ,परंतु चित्तौड़गढ़ की रानी ‘पद्मावती’ की कहानी सुनते ही आज भी दिल सहर उठता है।

हिंदुस्तान के इतिहास में दफ़न वह तारीख जब दिल्ली सल्तनत में खिलजी वंश के शाशक ने चित्तोड़गढ़ पर कब्ज़ा कर लिया था, आज भी सभी के ज़हन में है। ये तो सभी जानते हैं रानी पद्मावती चित्तौड़ की रानी थी, और उनका नाम ही रानी पद्मिनी था। रानी पद्मिनी के साहस और बलिदान की गौरवगाथा इतिहास में अमर है।

आइये खोलते इतिहास के इन पन्नो को…

अलाउद्दीन खिलजी

वह ख़िलजी वंश के संस्थापक जलालुद्दीन ख़िलजी का भतीजा और दामाद था।अलाउद्दीन ख़िलजी ने राज्य को पाने की चाह में अपने चाचा जलालुद्दीन की हत्या 22 अक्टूबर, 1296 को कर दी और दिल्ली में स्थित बलबन के लाल महल में अपना राज्याभिषेक सम्पन्न करवाया।

रानी की खूबसूरती पर मर मिटा

सिंहल द्वीप के राजा गंधर्व सेन और रानी चंपावती की बेटी पद्मिनी चित्तौड़ के राजा रतनसिंह के साथ ब्याही गई थी। कहा जाता है कि रानी पद्मिनी बहुत ही खूबसूरत थी और उनकी खूबसूरती पर एक दिन दिल्ली के सुल्तान ‘अलाउद्दीन खिलजी’ की बुरी नजर पड़ गई। दरअसल चित्तौड़गढ़ के किले में उसने दर्पण में रानी के प्रतिबिंब को देखा था ,रानी के खूबसूरत सौन्दर्य को देख कर अल्लाउद्दीन खिलजी रानी तरफ आकर्षित हो गया।

पद्मिनी को पाने के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार

चित्तौड़गढ़ को लूटने वाला अलाउद्दीन खिलजी राजसी सुंदरी रानी पद्मिनी को पाने के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार था इसलिए उसने चित्तौड़ पर हमला कर दिया। रानी पद्मिनी ने आग में कूदकर जान दे दी, लेकिन अपनी आन-बान पर आँच नहीं आने दी।

राणा को झांसे में लेकर चित्तौड़गढ़ में प्रवेश

खिलजी ने एक योजना बनाकर महाराणा रतन सिंह के पास संधि करने का प्रस्ताव भिजवाया और कहा कि मैं मित्रता का इच्छुक हूं और मैंने रानी पद्मावती कि बड़ी तारीफ़ सुनी है मैं सिर्फ उनके दर्शन करना चाहता हूं। कुछ गिने चुने सिपाहियों के साथ एक मित्र के नाते चित्तौड़गढ़ में प्रवेश करना चाहता हूं। इससे मेरी बात भी रह जाएगी और आपकी भी, लेकिन इसके पीछे खिलजी की एक गहरी चाल थी।

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रतनसिंह को बनाया बंधक

परंतु रतन सिंह को खिलजी के रचे हुए षड़यंत्र का जरा सा भी अंदाजा नही था। और वह खिलजी की मीठी बातो में आ गया। अपने कुछ गिने चुने सैनिको के साथ खिलजी ने चित्तौड़गढ़ में प्रवेश किया। महाराणा रतनसिंह ने मित्र के नाते खिलजी का स्वागत किया और जाते वक़्त खिलजी। को किले के द्वार तक पहुचाने आ गए इसी बीच मौके का फायदा उठाकर खिलजी ने महाराणा रतनसिंह को बंधक बना लिया।

पद्मावती की चतुराई से छूटे राणा

राजपूत सैनिको ने रतन सिंह को छुड़ाने के लिए बहुत से प्रयत्न किये, लेकिन वह असफल ही रहे और अलाउद्दीन खिलजी ने बार-बार यही कहलवाया के जब तक रानी पद्मावती हमारे पड़ाव में नही आएँगी तब तक रतन सिंह को मुक्त नही करेंगे। रानी पद्मावती ने भी अपनी सूझ भुज और चतुराई का इस्तेमाल करते हुए एक षड़यंत्र अलाउद्दीन खिलजी के खिलाफ रचा और कहलवाया कि वे एक शर्त पर ही उसके पड़ाव में आएंगी ,जब पहले राणा जी से मिलने दिया जाए।

खिलजी की सेना पर टूट पड़े

इस प्रस्ताव को खिलजी ने स्वीकार कर लिया योजना अनुसार रानी पद्मावती की पालकी में उनकी जगह उनका ख़ास ‘काका गोरा’ बैठा और दासियो की जगह पालकियों में राजपूत सैनिक बैठे, पालकियों को उठाने वालो के भेस में भी राजपूत सैनिक ही थे। इस तरह हजारों राजपूतों ने डोलियों में हथियार वगैरह भरकर अलाउद्दीन के डेरों की तरफ प्रस्थान किया, गोरा-बादल भी इनके साथ हो लिए।

गोरा-बादल भी वीरगति को प्राप्त हुए

खिलजी के आदेशानुसार सभी पालकियों को राणा रतनसिंह के पास जाने की इजाजत दे दी गयी, पालकिया राणा के तम्बू तक पहुची और मौका पाकर राणा रतन सिंह को किले की तरफ रवाना कर दिया गया और सभी योद्धा भूखे शेरो की तरह खिलजी की सेना पर टूट पड़े। अचानक हुए इस हमले के कारण खिलजी की सेना में भगदड़ मच गयी लेकिन गोरा-बादल भी कईं राजपूतों के साथ वीरगति को प्राप्त हुए।

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रानी ने किया जौहर

इस बात से खिलजी बेहद गुस्सा हो गया और बदला लेने के लिए आ धमका। खिलजी ने काफी समय तक चित्तौड़गढ़ के किले का घेराव किये रखा जिसके चलते चित्तौड़गढ़ के किले में खाने पीने की सामग्री की भी भारी मात्रा में कमी हो गयी इसके चलते राजपूतो को काफी कठिनायों का सामना करना पड़ा और राजपूतो ने खिलजी से समझौता करने की ठान ली ,परंतु यह बात रानी को बिलकुल भी पसंद नही आयी।

18 अगस्त, 1303 ई. को रानी पद्मिनी के नेतृत्व में चित्तौड़ के इतिहास का पहला जौहर हुआ | अपने सतीत्व की रक्षा के लिए 1600 क्षत्राणियों ने जौहर किया | अपनी लाज बचाने के लिए उन्होंने आग में कूदकर अपनी जान दे दी। और राणा ने भी केसरिया साफ बांध शाका व्रत का पालन करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।

क्या था यह जौहर?

जौहर पुराने समय में भारत में राजपूत स्त्रियों द्वारा की जाने वाली क्रिया थी। जब युद्ध में हार निश्चित हो जाती थी तो पुरुष मृत्युपर्यन्त युद्ध हेतु तैयार होकर वीरगति प्राप्त करने निकल जाते थे तथा स्त्रियाँ जौहर कर लेती थीं अर्थात जौहर कुंड में आग लगाकर खुद भी उसमें कूद जाती थी । जौहर कर लेने का कारण युद्ध में हार होने पर शत्रु राजा द्वारा हरण किये जाने का भय होता था।

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