एक ऐसा राष्ट्रपति जिसे शिक्षक के रूप में याद रखे जाने की थी ख्वाहिश

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महान वैज्ञानिक कहिये, प्रेरणादायक नेता कहिये या मिसाइल मैन कहिये डॉ एपीजे अब्दुल कलाम एक अद्भुत इंसान थे. विज्ञान की दुनिया में चमत्कारिक प्रदर्शन के कारण ही डॉ एपीजे अब्दुल कलाम के लिए राष्ट्रपति भवन के द्वार खुद ही खुल गए थे. बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ कलाम एक ऐसी भारतीय हैं (है मैं इसलिए लिख रही हूँ क्यूंकि वह अभी भी सबके दिलों में अच्छी यादों के साथ विद्यमान है) जो सभी के लिये महान आदर्श है. उनकी जीवन से जुड़ी कई रोचक घटनाएं हैं उनमे से कुछ घटनाएं हम आपके साथ साझा करेंगे.

मानवता का सही अर्थ समझाया

बात उन दिनों की है जब डॉ. कलाम डी.आर.डी.ओ में काम कर रहे थे. उस समय कुछ लोगों ने दीवार पर फेंसिंग करने के लिए कांच के टुकड़े लगाने की बात करी लेकिन डॉ. कलाम ने इस सुझाव को सुनते ही ठुकरा दिया. उनका कहना था कि अगर ऐसा हुआ तो दीवार पर बैठने वाले पक्षियों को चोट लग सकती थी वह घायल हो सकते थे.

जब डॉ. कलाम ने कुर्सी पर बैठने से मना किया

एक बार डॉ. कलाम को आईआईटी वाराणसी के दीक्षांत समारोह में मुख्य अथिति के रूप में बुलाया गया. अब ज़ाहिर सी बात है मुख्य अतिथि थे तो उन्हें सम्मान भी उसी तरह का देना था. इसलिए स्टेज पर 5 कुर्सियां रखी गयी  थी, जिनमे से चार कुर्सियां तो यूनिवर्सिटी के शीर्ष अधिकारियों के लिए थी और बीच वाली कुर्सी, डॉ कलाम की थी. डॉ कलाम ने जब देखा कि उनकी कुर्सी, अन्य कुर्सियीं की तुलना में थोड़ी ऊँची थी. तब उन्होंने इस पर बैठने से इनकार कर दिया और यूनिवर्सिटी के वाईस चांसलर को उस पर बैठने का अनुरोध किया.

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आम आदमी के प्रति सम्मान

डॉ कलाम राष्ट्रपति बनने के बाद अपनी पहली यात्रा पर केरल गए थे. क्या आप जानते हैं अपनी पहली केरल यात्रा के दौरान उन्होंने केरल राजभवन में किसे राष्ट्रपति मेहमान के रूप में आमंत्रित किया था… जी वह कोई और नहीं सड़क के किनारे बैठने वाला मोची और एक छोटे से होटल का मालिक था. यह उनका आम आदमी के प्रति सम्मान था.

अपने जीवन भर की कमाई एक संस्था को दान की

जैसा कि आप सब जानते हैं कि भारत सरकार, वर्तमान राष्ट्रपति के साथ-साथ सभी पूर्व राष्ट्रपति का ख्याल रखती है. इसलिए जब डॉ एपीजे अब्दुल कलाम, राष्ट्रपति बने तो उन्होंने अपने जीवनभर की कमाई, PURA (एक ऐसी संस्था है जो ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी सुविधा उपलब्ध कराती है.) नामक संस्था को दे दिया. डॉ कलाम ने अमूल के संस्थापक डॉ वर्गीज कुरियन को फोन किया और यह पूछा कि अब मैं इस देश का राष्ट्रपति हूँ और भारत सरकार, मेरे जीवित रहने तक, मेरा ख्याल रखेगी, इसलिए मैं इस बचत और वेतन का क्या करूँगा? ऐसे थे हमारे मिसाइल मैन.

साहस की एक मिसाल

डॉ. कलाम के साहस के बारे में बात की जाये तो उनकी एक किताब में एक घटना का ज़िक्र है. उस किताब में डॉ. कलाम ने लिखा है कि जब वो SU-30 MKI एयर क्राफ्ट उड़ा रहे थे तो एयर क्राफ्ट के नीचे उतरने पर कई नौजवान और मीडिया के लोग उनसे बातें करने लगे. एक ने कहा कि आपको 74 साल की उम्र में सुपरसोनिक फाइटर एयरक्राफ्ट चलाने में डर नहीं लगा? इस पर डॉ कलाम का जवाब था, “चालीस मिनट की फ्लाइट के दौरान मैं यंत्रों को कंट्रोल करने में व्यस्त रहा और इस दौरान मैंने डर को अपने अंदर आने का समय ही नहीं दिया.

शिक्षक के रूप में याद रखे जाने की थी ख्वाहिश

एक बार एक पत्रकार ने डॉ एपीजे अब्दुल कलाम से एक पत्रकार ने एक साक्षात्कार के दौरान प्रश्न किया, “आप किस रूप में याद किया जाना पसंद करेंगे- एक वैज्ञानिक, एक राष्ट्रपति या एक शिक्षक के रूप में? आप जानते हैं डॉ. कलाम का जवाब क्या था? उन्होंने कहा था – “शिक्षण एक बहुत ही महान पेशा है जो किसी व्यक्ति के चरित्र, क्षमता, और भविष्य को आकार देता है. अगर लोग मुझे एक अच्छे शिक्षक के रूप में याद रखते हैं, तो मेरे लिए ये सबसे बड़ा सम्मान होगा.“

बच्चों के प्रति लगाव

जब डॉ कलाम डी.आर.डी.ओ. में बतौर वैज्ञानिक काम करते थे तब एक बार उनके नीचे काम कर रहे एक वैज्ञानिक ने, अपने बच्चों को प्रदर्शनी ले जाने का वादा किया. लेकिन काम के दबाव के कारण, वह बच्चों को प्रदर्शनी में नहीं ले जा सका. जब यह बात, डॉ कलाम को पता चली तो उन्हें बहुत हैरानी हुई और वह खुद उस वैज्ञानिक के बच्चों को प्रदर्शनी में लेकर गए.

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डॉ. कलाम के बचपन का प्रसंग 

दीपावली त्योहार का दिन था, एक छोटा मुस्लिम बालक भी हिन्दुओं का यह उल्लासपूर्ण पर्व मनाना चाहता था, लेकिन वह बहुत गरीब था, चूँकि वह अखबार बेचकर अपनी पढ़ाई का खर्च जुटाता था और दो पैसे की मदद अपने माता पिता की भी करता था, अतः उसके पास पर्याप्त पैसों की कमी थी. संयोगवश उस दिन उसने अखबार बेचकर अन्य दिनों की अपेक्षा पाँच पैसे ज्यादा कमाये. तब वह पटाखे वाले के पास जाता है और उससे एक रॉकेट मांगता है लेकिन दूकानदार इतने कम पैसे में रॉकेट देने से इनकार कर देता है. वह बच्चा दूकानदार से ख़राब पटाखे खरीद लेता है. इसके बाद वह पाँच पैसे में ढेर सारे खराब पटाखों का कूड़ा उठा लाया और एक नहीं कई रॉकेट बनाये और उस दिन उसके गाँव में मुस्लिम मोहल्ले में गगन की दूरी नापने वाले दीवाली के रॉकेट केवल उस बालक के आँगन से ही छोड़े गये थे. वह बालक ही आगे चलकर मिसाइल-मैन के नाम से प्रसिद्ध हुआ और बाद में वह बालक भारत का राष्ट्रपति भी बना. उस बालक का नाम ए. पी. जे. अब्दुल कलाम था.

ऐसे आदर्श महापुरुष थे डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम. सच कहें तो आज हमारे देश को डॉ कलाम जैसे महान व्यक्तित्व की आवश्यकता है जो नि:स्वार्थ भावना से सबकी मदद कर सकें.

 

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