कुछ अनोखी कहानियाँः जो न मनुष्य रह गए थे और न जानवर

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रुडयार्ड किपलिंग की बुक ‘द जंगल बुक’ तो आप सभी ने पढ़ी और देखी होगी और उसका शीर्षक गीत “जंगल जंगल बात चली है पता चला है चड्ढी पहनकर फूल खिला है फूल खिला है” सबको याद ही होगा. लेकिन आपने कभी सोचा है कि किताबों और टीवी की दुनिया के बाहर भी मोगली जैसे बच्चे हो तो यानी जिनका पालन पोषण जानवरों ने किया हो तो कैसा हो. दरअसल बाहरी दुनिया में भी ऐसे जंगल बॉय और जंगल गर्ल हैं जिनका पालन पोषण जानवरों द्वारा किया गया. तो आइये आज आपकी मुलाकात कुछ ऐसे ही बच्चों से कराते हैं.

एंडीज का गोट बॉय

1990 में 12 साल का एक लड़का पेरू में एनडीस की पहाड़ियों पर बकरियों के झुण्ड के साथ मिला. उसने अपने ८ साल बकरियों के झुण्ड के साथ गुज़ारे थे. 4 साल की उम्र से वह बकरियों के साथ रह रहा था. वह इन्ही बकरियों का दूध पीकर अभी तक जीवित था. हालाँकि अभी तक यह ज्ञात नहीं हुआ की वह वहाँ तक पहुंचा कैसे.

जब इसे देखा गया तब वेह इंसानों की तरह नहीं बल्कि बकरियों की तरह चलता था और उसके हाथ की बनावट भी बकरियों के पांव के जैसी हो गयी थी. इतना ही नहीं बकरियों के झुण्ड में रहने के कारण वह  मनुष्यों के तौर तरीके, उनका रहन सहन सब भूल गया था. लेकिन वह बकरियों के हाव भाव उनके इशारे स्पष्ट रूप से समझता था.

यू एस की केन्सास यूनिवर्सिटी की एक टीम ने उस बच्चे पर रिसर्च की और बताया कि हाथ और पांव पर चलने के कारण उसकी हड्डियों का विकास इंसानी ढांचे की तरह नहीं हो पाया था. इस बच्चे का नाम डेनियल रखा गया.

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उत्तराखंड का लेपर्ड बॉय

हफिंगटन पोस्ट में एक कहानी प्रकाशित हुई थी. इस कहानी में एक ‘तेंदुआ बच्चे’ के बारे में जानकारी दी गई थी. उनका कहना था कि उत्तराखंड के ढूंगी में दो साल के एक बच्चे को 1912 में एक मादा तेंदुआ उस समय उठा ले गई थी, जब उसकी मां खेतों में काम कर रही थी.

उस तेंदुए ने ऐसा इसलिए किया था क्योंकि ग्रामीणों ने उसके बच्चों को मार दिया था. तीन वर्ष के बाद जब वह बच्चा पांच वर्ष का हो गया तब शिकारियों ने उस मादा तेंदुए का शिकार किया और वह बच्चा मिल गया. लेकिन, लोगों के बीच में वापस आने के बाद भी वह बच्चा अपने चारों हाथ-पैरों से चलता था और उसकी गति और सूंघने की शक्ति बेजोड़ हो चुकी थी.

ब्रिटिश पक्षी विज्ञानी और पुलिस अधिकारी एक स्टुअर्ट बेकर ने इस लेपर्ड बॉय से मुलाकात के बाद बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (बी एन एच एस) की पत्रिका में इस बाबत एक रिपोर्ट भी छापी थी.

पश्चिम बंगाल की वुल्फ सिस्टर्स

1920 में पश्चिम बंगाल के मिदिनापुर जिले में 2 बच्चियां भेड़ियों की मांद में मिली थीं. उस समय एक लड़की जिसका नाम बाद में कमला रखा गया की उम्र आठ साल थी और दूसरी लड़की डेढ़ साल की जिसका नाम अमला रखा गया था.

इस बात का दावा करने वाले जोसफ अमृतो लाल सिंह एक पेड़ के पीछे छुपे रहे और जब भेड़िए अपनी मांद से निकल गए, तब उन्होंने वहां से दोनों बच्चों को निकाला. वे उन बच्चों को अपने साथ अनाथालय ले आए. वे दोनों बच्चियां भयंकर दिखाई देती थीं. वे गुर्राती और लोगों से दूर भागती थीं.

अपने कपड़े फाड़ देने के अलावा वे केवल कच्चा मांस ही खाती थीं. उनकी देखने और सूंघने की क्षमता अभूतपूर्व थी. लेकिन अमला ज्यादा दिन जीवित नहीं रह पायी जंगल से लाने के साल भर बाद ही उसकी मृत्यु हो गयी. लेकिन बाद में कमला ने सीधे चलना और थोड़ा-बहुत बोलना सीख लिया था, पर किडनी फेल होने के बाद सत्रह साल की उम्र में चल बसी.

इन दोनों बच्चियों की कहानी का उल्लेख भानु कपिल की किताब ‘ह्यूमन एनिमल’ ने ही खींची थीं. इस बच्चे के बारे में कहा गया है कि उत्तरप्रदेश के सुल्तानपुर जिले के नारायणपुर गांव में रहने वाले एक किसान नरसिंह बहादुर सिंह जंगल के बीच से गुजर रहे थे, तभी उन्होंने चार-पांच साल के एक बच्चे को भेड़िए के बच्चों के साथ भागते हुए देखा.

नरसिंह उस बच्चे को किसी तरह पकड़कर घर ले आए, पर उस बच्चे ने वहां से छूटने के लिए लोगों को काटना, गुर्राना और नोंचना शुरू कर दिया.   नरसिंह ने काफी समय तक कच्चा मांस खिलाकर उस बच्चे को अपने पास रखा, फिर मदर टेरेसा के चैरिटी मिशनरी ‘प्रेम निवास’ भेज दिया.

यूक्रेन की डॉग गर्ल

अपने माता-पिता की उपेक्षा की शिकार ओक्सना मालाया को तीन वर्ष से आठ वर्ष की आयु तक एक कुत्ताघर में रहना पड़ा था.  उस दौरान केवल कुत्ते ही उसके साथी और करीबी प्राणी थे. वर्ष 1991 में जब वेह मिली तब वह बोल नहीं पाती थी केवल कुत्तों की तरह भौंकती थी.

वह दोनों हाथों और पैरों से घूमती थी. आज वह बीस वर्ष से अधिक उम्र की है, उसे बोलना सिखाने की कोशिश की गई लेकिन वह मानसिक रूप से थोड़ी कमज़ोर है और फिलहाल एक मानसिक संस्थान में रहती है और इसके पास एक फार्म में गायें रहती हैं जिनकी वह देखभाल करके खुश रहती है.

कंबोडिया की जंगल गर्ल

कंबोडिया में जंगल के किनारे पर भैंसें चराने वाली आठ वर्ष की रोशम पैनजीइंग जंगल में खो गई थी और रहस्यमय ढंग से गायब रहने के करीब 18 वर्ष बाद 2007 में उसे एक किसान ने देखा.  वह महिला नग्नावस्था में थी और उस किसान के खेतों से चावल चुरा रही थी.

बाद में, उसकी पहचान रोशम पेनजीइंग के तौर पर हुई. वह तीस वर्ष की महिला हो गई थी लेकिन उसने खुद को किसी तरह से घने जंगलों में जीवित रखा. वह स्थानीय संस्कृति में ढल नहीं सकी और उसे स्थानीय भाषा भी नहीं आई ऐसा कहा जाता है की मई 2010 में वो फिर से जंगल भाग गयी.

उगांडा का मंकी बॉय

एक बच्चे ने अपने पिता को माँ की हत्या करते हुए देख लिया था. अपने पिता से डरकर वह बच्चा जिसका नाम जॉन सेबुन्या था जंगल में भाग गया. ऐसा माना जाता है कि उसे जंगल में छोटे आकार वाले दक्षिण अफ्रीकी बंदरों ने पाला था. 1991 में गाँव के कुछ लोगों ने उस बच्चे को बंदरों के साथ देखा. जब गो वाले उसे अपने ले जाने का प्रयास कर रहे थे तब उसने ही नहीं बल्कि बंदरों ने भी उनका कदा प्रतिरोध किया. हालाँकि अब वह गाँव में ही रहता है और उसने ब्प्लना और गाना सीख लिया है अब वह अफ़्रीकी बच्चों के साथ यात्राओं पर भी जाता है.

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एविरॉन का विक्टर

अब तक जितने भी जंगली (फेरल) बच्चे पकड़े गए हैं, उनमें विक्टर सबसे ज्यादा प्रसिद्ध हुआ है.  इस बच्चे के ऊपर एक फ्रेंच फिल्म ‘ल इन्फेंट सॉवेज’ भी बनी है. आप कह सकते हैं इस फिल्म के ज़रिये ही इस बच्चे का परिचय दुनिया से हुआ. उसके पैदाइश को लेकर भी काफी रहस्य बने हुए है लेकिन ऐसा माना जाता है कि उसने अपना सारा बचपन नग्न अवस्था में ही जंगल में गुज़ारा है.

पहली बार उसे 1797 में देखा गया था, उस समय विक्टर की उम्र 12 साल थी. उसके बाद कुछ शिकारियों ने उसे देखा लेकिन विक्टर उनसे छिप रहा था लेकिन शिकारियों ने उसे पकड़ लिया और उसे अपने साथ ले गए. ऐसा कहा जाता है की विक्टर को वहां का जीवन रास न आता था इसलिए वो करीब 8 बार वहां से भाग चुका था. विक्टर एक ऐसा बच्चा था जिस पर वैज्ञानिकों ने कई शोध किये. उसे बोलना सिखाने का कई बार प्रयास किया गया लेकिन ऐसा संभव न हो पाया, बाद में ऐसा मान लिया गया कि वह बच्चा मानसिक रूप से अस्वस्थ है. 1828 में 40 वर्ष की आयु में विक्टर की मृत्यु हो गयी, पर मृत्यु का कारण क्या था यह पता नहीं चल पाया.

ऐसे ही न जाने कितने रियल लाइफ फेरल यानि जंगली बच्चे हैं जिनके लिए सभ्यता एक अकल्पनीय बात है. उन्हें लोगों ने इंसानी दुनिया में लाने का काफी प्रयास किया जिनमे से कुछ तो वापस चले गए और कुछ यहाँ के जीवन में टिक नहीं पायी.

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