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जब 2000 पाकिस्तानी सैनिकों पर भारी पड़े 90 भारतीय सैनिक

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Written by Rahul Ashiwal

पाकिस्तान कभी भी अपनी नापाक हरकतों से बाज नहीं आता, लेकिन जब-जब पाकिस्तान भारत से टकराया है हमेशा उसे मुंह की ही खानी पड़ी। विबाजन के पश्चात् भी पाकिस्तान की बार भारत पर आक्रमण कर चुका है। आपको अफ़साना सुनाते हैं 1971 का जब सिर्फ 90 भारतीय सैनिकों ने हज़ारों पाकिस्तानी सैनिकों को खदेड़ दिया और उसे हकीकत से रूबरू कराया। जानिए क्या हुआ था 1971 में जब पाकिस्तान को याद आई उसकी नानी..

पाक ने किया भारत पर हमला

1971 में छिड़ी भारत-पाक की जंग का ये आखिरी दिन था, 4 दिसंबर की रात को भारत पाकिस्तान के ‘रहीमयार खान डिस्ट्रिक्ट क्वार्टर’ पर अटैक करने वाला था। किन्हीं वजहों से भारत अटैक नहीं कर पाया, पर बीपी 638 पिलर की तरफ से आगे बढ़ते हुए पाकिस्तान ने भारत की लोंगेवाला चेकपोस्ट पर अटैक कर दिया। यहां से उनका जैसलमेर जाने का प्लान था। इसके लिए वो पूरी तैयारी के साथ आगे बढ़ रहे थे।

भारत लोंगेवाला पॉइंट पर कमजोर नज़र आ रहा था, क्योंकि उस वक्त लोंगेवाला चेकपोस्ट सिर्फ 90 जवानों की निगरानी में थी। कंपनी के 29 जवान और लेफ्टिनेंट ‘धर्मवीर’ इंटरनेशनल बॉर्डर की पैट्रोलिंग पर थे। देर शाम उन्हें जानकारी मिली कि दुश्मन के बहुत सारे टैंक एक पूरी ब्रिगेड के साथ लोंगेवाला पोस्ट की तरफ बढ़ रहे हैं।

और इस पूरी ब्रिगेड में 2 हजार से ज्यादा जवान रहे होंगे। कुछ ही समय बाद लश्कर का सामना भारत की सेना की एक छोटी सी टुकड़ी के साथ होना था और सबसे बड़ी बात ये थी के भारतीय सेना को न जमीनी न हवाई किसी तरह की मदद उस दौरान मिलना संभव नहीं थी, जिससे उनकी परेशानी और बढ़ गई थी। चाहते तो ये जवान पोस्ट को छोड़कर पीछे हठ सकते थे, लेकिन पीछे हठने के बजे भारतीय सैनिका ने अपनी मातृभूमि की रक्षा करते हुए पाकिस्तान को जवाब देने की सोची।

भारतीय जवान पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए तैयारी में लग गए। कुछ ही देर बाद पाकिस्तानी टैंकों ने गोले बरसाते हुए भारतीय पोस्ट को घेर लिया। वे आगे बढ़ते जा रहे थे और उनके पीछे पाकिस्तानी सेना पूरे आर्म्स के साथ आगे बढ़ रही थी। भारतीय सेना के पास कुछ था तो बस, जीप पर लगी ‘रिकॉयललैस राइफल’ और ‘81एमएम मोर्टार’ जिससे भारतीय सेना ने जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी।

पूरे जोश के साथ भारतीय सेना ने गोलियों की बौंछार शूरू कर दी, शुरुआती कार्रवाई इतनी दमदार थी कि पाकिस्तानी सेना ने कुछ दूरी पर रुककर जंग लड़ने का फैसला किया। पाकिस्तानी हज़ार से ज्यादा थे और भारतीय 100 से भी कम। वो रात इम्तिहान की रात थी। शैलिंग के थमते कुछ सुनाई दे रहा था तो गूंज रहे शब्द ‘जो बोले सो निहाल सत श्री अकाल।’ भले ही भारतीय सेना के पास पूरे हथियार नहीं थे, लेकिन वो सब जोश से लबालब थे।

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पाक सेना जैसलमेर पर अपना कब्जा करना चाहती थी। पाक सेना के इरादे के मुताबिक वह चेकपोस्ट पर कब्जा कर रामगढ़ से होते हुए जैसलमेर तक जाना चाहते थे। पर भारतीय सेना के इरादे भी फौलादी थे, जो दीवार बन कर उनके समाने खड़े थे। रात होते-होते अब तक भारत की छोटी सी टुकड़ी ने दुश्मन के 12 टैंक तबाह कर दिए थे। लेकिन ज्यादातर जवान शहीद हो चुके थे और भारतीय सेना को इंडियन एयरफोर्स की मदद की जरूरत थी।

जैसलमेर एयरबेस पर उस वक्त सिर्फ 4 हंटर एयरक्राफ्ट और सेना के ऑब्जर्वेशन पोस्ट के दो विमान थे। हंटर एयरक्राफ्ट रात के अंधेरे में हमला नहीं कर सकते थे, इसलिय एयरफोर्स भारतीय सेना की मदद नहीं कर सकती थी। अब इंतजार सुबह का था। अल सुबह ही 2 हंटर विमान लोंगेवाला की तरफ निकल पड़े। उस वक्त रोशनी इतनी कम थी कि आसमान की ऊंचाई से जमीं का अंदाजा लगा पाना मुश्किल था। तब न तो नेविगेशन सिस्टम इतना मॉडर्न था और न ही कोई लैंडमार्किंग थी। ऐसे में दोनों विमान जैसलमेर से लोंगेवाला तक जाने वाली सड़क के रास्ते को देखते हुए आगे बढ़ रहे थे।

अपने मजबूत इरोदों के साथ भारतीय सेना पूरी रात भर पाकिस्तानी सेना के सामने चट्टान के जैसे खड़ी रही। रातभर गोलीबारी जारी ही थी कि इंडियन एयरफोर्स से भी मदद मिल गई। इंडियन एयरफोर्स के दो हंटर विमानों ने पाकिस्तानियों के परखच्चे उड़ा दिए। वे बौखलाए टैंक लेकर इधर-उधर दौड़ने लगे। सुबह के बाद तक हम पाकिस्तानी सेना को उन्हीं की हद में 8 किलोमीटर अंदर तक खदेड़ चुके थे।

इस पर बन चुकी है फिल्म बॉर्डर

साल 1997 में आई हिंदी फिल्म बॉर्डर 1971 के युद्ध पर आधरित थी। इस फिल्म में सनी देओल ने मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी की भूमिका निभाई थी। ये फिल्म आज भी भारतीयों में जोश भर देती है।

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