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1972 एंडीज फ्लाइट डिजास्टर का, ज़िन्दा रहने के लिए खानी पड़ी अपने ही साथियों की लाशें

पानी की समस्या,बर्फ के पानी, मरने के बाद,हार की जीत,पानी की कमी,जिंदगी की तलाश में हम
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Written by Rahul Ashiwal

जिनके हौसले बुलंद हो और विपरीत परिस्थितियों में भी ज़िन्दा रहने की चाह हो, उन्हें कोई नहीं हरा सकता, मौत भी नहीं। जब मौत सामने हो तो ऐसे कम ही लोग होते हैं जो ज़िन्दा रहने के लिए लड़ते हैं। आज के  अफसाने में हम आप को सुना रहें हैं एक ऐसा ही दिल दहला देने वाला हादसा जिसे सुकर किसी के भी रोंगटे खड़े हो जाए और उससे भी ज्यादा, ऐसे लोगों की दास्तां जिनका बचना नामुमकीन था, लेकिन फिर भी उन लोगों ने मौत को हरा कर जिंदगी की जंग जीती। ये विमान हादसा हुआ 1972 में एंडीज (Andes) के बर्फीले पहाड़ों में।

इस हादसे में जिन्दा बचे लोगों को आदमखोर हवाओं के बीच बर्फीले पहाड़ों में बिना भोजन बिना किसी सहायता के 72 दिनों तक रहना पड़ा। अपने घायल साथियों को अपनी आखों के सामने मरते देखना पड़ा, इतना ही नहीं यहां तक कि जिन्दा रहने के लिए अपने ही साथियों कि लाशें तक खानी पड़ी।

ये घटना 1972 में हुई एंडीज फ्लाइट डिजास्टर (1972 Andes flight disaster)  या मिरेकल ऑफ़ एंडीज (Miracle of the Andes) के नाम से जानी जाती है। ये कहानी उस फ्लाइट में सवार ‘उरुग्वे के ओल्ड क्रिश्चियन क्लब’ की रग्बी टीम (Old Christians Club rugby union team) के उन दो खिलाड़ियों के हौसले के लिए भी जानी जाती हैं, जिन्होंने एक सच्चे खिलाड़ी की तरह अंत तक हार न मानने वाले ज़ज्बे को दिखाते हुए न सिर्फ खुद मौत को मात दी बल्कि अपने 14 लोगों की जिंदगी भी बचाई।

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कभी ना भूला जाने वाला यह दर्दनाक हादसा हुआ था 13 अक्टूबर 1972 को और इसका शिकार हुई थी उरुग्वे के ओल्ड क्रिश्चियन क्लब की रग्बी टीम। दरअसल यह टीम फ्लाइट से चिली के सैंटियागो में मैच खेलने के लिए जा रही थी। उरुग्वे एयरफोर्स का प्लेन टीम के खिलाड़ियों व अधिकारियों के साथ उनके परिवार व मित्रों के साथ 45 लोगों को लेकर एंडीज पर्वत के ऊपर से गुजर रहा था।

उरुग्वे एयरफोर्स के प्लेन के उड़ान भरने के कुछ समय बाद ही मौसम खराब होने लगा। खराब मौसम की वजह से एंडीज के सफ़ेद बर्फीले पहाड़ों में पायलट को कुछ भी नज़र नहीं आ रहा था। करीब 14 हजार फीट की ऊंचाई पर पायलट अपनी पोजीशन का सही अंदाजा नहीं लगा पाया और एक ही पल में एयरक्राफ्ट एंडीज पर्वत की एक विशाल चोटी से टकरा गया। जो एयरक्राफ्ट कुछ देर पहले हवा से बातें कर रहा था दूसरे ही पल धू-ध कर जलता एंडीज पर्वत की बर्फिली चोटियों में गुम हो गया। दुर्घटना के बाद इस एयरक्राफ्ट से कोई संपर्क नहीं हो पा रहा था।

इस दर्दनाक हादसे में 18 लोगों की तत्काल ही मौत हो गई। बाकी 27 लोग जैसे तैसे बच तो गए लेकिन एंडीज की बेहद सर्द हाड़ कपकपा देने वाली बर्फिली हवाओं के बीच जिंदगी उनके लिए मौत से भी बदतर साबित हो रही थी। न खाने को कुछ और दूर-दूर तक सिर्फ बर्फ ही बर्फ। हालात ऐसे नज़र आ रहे थे कि जिंदगी भी मौत से बदतर लगने लगी थी।

इस हादसे की खबर मिलते ही उरुग्वे की सरकार ने तुरंत सक्रियता दिखाई और रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू कर दिया, लेकिन प्लेन का रंग सफेद होने के कारण बर्फ से ढके सफेद एंडीज पर उसे ढूँढना घास के ढेर में सुई ढूंढने के बराबर था। 10 दिनों तक असफलता हाथ लगने पर सरकार ने 11 वें दिन  रेस्क्यू ऑपरेशन बंद कर दिया गया, क्योंकि सबका मानना था कि एंडीज के इतने सर्द मौसम में बिना खाना पानी के किसी का भी इतने दिनों तक जिन्दा रहना मुमकिन नहीं था, ऑपरेशन खत्म होने के बाद रही सही उम्मीद भी जाती रही।

लेकिन किसी को क्या पता था कि उन विपरीत परिस्थितियों में भी वहां बचे हुए लोग मदद मिलने की उम्मीद लगाए बैठे थे। उधर बचे हुए 27 लोगो में से कुछ घायल लोग जिंदगी की जंग हार चुके थे। बाकी बचे लोगों ने अपने पास उपलब्ध भोजन को छोटे-छोटे हिस्सों में बाट लिया ताकि वो ज्यादा दिन तक चल सके।

पीने के पानी कि कमी को दूर करने के लिए उन्होंने प्लेन में से एक ऐसे मेटल के टुकड़े को निकाला जो कि धूप में बहुत जल्दी गर्म हो सके उस पर बर्फ रख कर उसे पिघला कर पानी इकठ्ठा करने लगे। इससे उनकी पानी कि समस्या तो हल हो गयी, पर कुछ ही दिनों में भोजन समाप्त हो गया। अब उनके पास खाने के लिए कुछ भी नहीं बचा। अंत में कोई रास्ता नहीं दिखा तो इन लोगों ने अपने साथियों की लाश के टुकड़े कर उन्हें ही खाना शुरू कर दिया। ऐसा करना आसान नहीं था, लेकिन ज़िन्दा रहने के लिए ऐसा करना जरूरी हो चला था। वे लोग रोते रहे और अपने साथियों की लाशों के टुकड़े खाते रहें।

लेकिन कोई मदद ना मिलने पर इतनी ठंड में ये लोग अब असहनीय अंत की ओर बढ़ रहे थे। केवल 16 लोग ही अब जीवित बचे थे, हादसे के 60 दिन बीत चुके थे। मदद की कोई उम्मीद दिखाई नहीं दी तो इन लोगों  में शामिल दो खिलाड़ियों ‘नैन्डो पैरेडो’ (Nando Parrado) और ‘रॉबटरे केनेसा’ (Robert Canessa) ने सोचा कि यहां पड़े पड़े मरने से अच्छा है मदद कि तलाश में निकला जाए।

हांलाकि ये बात वो भी जानते थे कि ये बहुत ही मुश्किल काम है। 60 दिनों के अंदर दोनों का शरीर कमजोर हो चूका था, बर्फ़ पर ट्रैकिंग करने के लिए उनके पास पर्याप्त साधन भी नहीं थे। लेकिन दोनों खिलाड़ी थे और खिलाड़ियों के अंदर अंत तक हार नहीं मानने का ज़ज्बा होता हैं। यही ज़ज्बा उन दोनों खिलाड़ियों के काम आया और उन्होंने उन्हीं विपरीत परिस्थतियों में मदद कि खोज के लिए ट्रैकिंग शरू कर दी और निकल पड़े मदद ढुंढने के लिए।

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दोनें खिलाड़ी पैरेडो और केनेसा ने ग़जब का साहस दिखाते हुए 12 दिनों तक ट्रैकिंग की और आखिर में दोनों एंडीज पर्वत को हराते हुए चिली के आबादी वाले क्षेत्र तक पहुंच गए जहां दोनों ने रेस्क्यू टीम को अपने साथियों की लोकेशन बताई। इस तरह इन दोनों खिलाड़ियों ने तो जिंदगी की जंग जीत ही ली साथ ही अपने साथियों के लिए भी ये वरदान साबित हुए।

मौत को हरा जिंदगी की जंग जितने वाले पैरेडो ने इस पूरे हादसे और अपने संघर्ष का कहानी को एक किताब की शक्ल भी दी। इस भयावह घटना पर ‘पियर्स पॉल रीड’ ने 1974 में एक किताब ‘अलाइव’ (Alive) लिखी थी जिस पर 1993 में निर्देशक फ्रेंक मार्शल ने फिल्म भी बनाई थी। ये कहानी हमें सिखाती है कि परिस्थिती कितनी ही विपरीत क्यों ना हो हमे हार नहीं माननी चाहिए “NEVER GIVE UP”

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