सुनिये इवीएम की कहानी, इवीएम की जुबानी

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नमस्कार दोस्तों, पहचाना मुझे… नहीं पहचाना  चलिए कुछ हिंट देती हूँ मैं वो हूँ जिसका आपको हर चुनाव पर इंतज़ार रहता है, मैं वो हूँ जिसके बिना चुनाव का कोई मतलब नहीं, मैं वो हूँ जिसके बिना चुनाव संभव नहीं है… अब भी नहीं पहचाना तो चलिए मैं खुद ही अपना राज़ खोल देती हूँ. मैं हूँ इवीएम यानी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन. अब आप सोच रहे होंगे कि मेरा इजाद कब हुआ और क्यूँ हुआ.

तो देखिये स्वतंत्र तथा निष्पक्ष चुनाव किसी भी देश के प्रजातांत्रिक मूल्यों के लिए महत्‍वपूर्ण होते हैं. इसमें निष्पक्ष, सटीक तथा पारदर्शी निर्वाचन प्रक्रिया में ऐसे परिणाम शामिल हैं जिनकी पुष्टि स्वतंत्र रूप से की जा सकती है. परम्परागत मतदान प्रणाली इन लक्ष्य में से अनेक पूरा तो करती है लेकिन फर्जी मतदान तथा मतदान केन्द्र पर कब्जा जैसा दोष पूर्ण व्यवहार लोकतंत्र भावना के लिए गंभीर खतरे हैं.

इस तरह भारत का निर्वाचन आयोग स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए निर्वाचन प्रक्रिया में सुधार का प्रयास करता रहा है. और इसी प्रयास के दौरान मेरी खोज शुरू हुयी. भारत इलेक्ट्रोनिक्स लिमिटेड, बंगलौर तथा इलेक्ट्रानिक्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, हैदराबाद के सहयोग से भारत निर्वाचन आयोग ने मेरी यानी ईवीएम (इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन) की खोज तथा डिजायनिंग की.

मेरा यानी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (इवीएम) का इस्तेमाल भारत में आम चुनाव तथा राज्य विधानसभाओं के चुनाव में आंशिक रूप से 1999 में शुरू हुआ और 2004 से इसका पूर्ण इस्तेमाल हो रहा है. लेकिन क्या आप जानते हैं की सबसे पहले मेरा प्रयोग कब शुरू हुआ था? चलिए आपको लेकर चलती हूँ अपने क्रमिक विकास की ओर.

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मेरी (इवीएम) शुरुआत

मेरा पहली बार प्रयोग मई, 1982 में केरल के परूर विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र के 50 मतदान केन्द्रों पर हुआ, लेकिन 1983 के बाद मेरा यानी ईवीएम का प्रयोग नहीं किया गया. अब आप सोच रहे होंगे ऐसा क्यूँ, वो इसलिए क्योंकि चुनाव में वोटिंग मशीनों के प्रयोग को वैधानिक रूप दिए जाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का आदेश जारी हुआ था. दिसम्बर, 1988 में संसद ने इस कानून में संशोधन किया और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1952 में एक नयी धारा 61-ए जोड़ी गयी. इस धारा के अनुसार आयोग को मेरा (इवीएम) का प्रयोग करने का पूर्ण अधिकार था.  लेकिन यह संशोधित प्रावधान 15 मार्च 1989 से प्रभावी हुआ.

विशेषज्ञ समिति का गठन

केन्द्र सरकार द्वारा फरवरी, 1990 में अनेक मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय तथा क्षेत्रीय दलों के प्रतिनिधियों वाली चुनाव सुधार समिति बनाई गई. भारत सरकार ने मेरे (इवीएम) प्रयोग संबंधी विषय को विचार के लिए चुनाव सुधार समिति को भेजा. इसके उपरान्त  भारत सरकार ने एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया. इसमें प्रोफेसर एस.सम्पत तत्कालीन अध्यक्ष आर.ए.सी, रक्षा अनुसंधान तथा विकास संगठन, प्रोफेसर पी.वी. इन्द्रसेन (तब आईआईटी दिल्ली के साथ) तथा डॉ.सी.राव कसरवाड़ा, निदेशक इलेक्ट्रोनिक्स अनुसंधान तथा विकास केन्द्र, तिरूअनंतपुरम शामिल किए गए. समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि ये मशीनें छेड़छाड़ मुक्त हैं.

पुनः तकनीकी विशेषज्ञ समिति का गठन

24 मार्च 1992 को सरकार के विधि तथा न्याय मंत्रालय द्वारा चुनाव कराने संबंधी कानूनों, 1961 में आवश्यक संशोधन की अधिसूचना जारी की गई.  आयोग ने चुनाव में नई इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीनों के यानी मेरे प्रयोग करने से पहले उनके मूल्यांकन के लिए एक बार फिर तकनीकी विशेषज्ञ समिति का गठन किया. इस बार प्रोफेसर पी.वी. इन्द्रसेन, आईआईटी दिल्ली के प्रोफेसर डी.टी. साहनी तथा प्रोफेसर ए.के. अग्रवाल इसके सदस्य बने. तब से निर्वाचन आयोग मुझसे (ईवीएम) से जुड़े सभी तकनीकी पक्षों पर स्वर्गीय प्रो.पी.वी. इन्द्रसेन, प्रो.डी.टी. साहनी तथा प्रो.ए.के. अग्रवाल से लगातार परामर्श लेता रहा है. नवम्बर, 2010 में आयोग ने तकनीकी विशेषज्ञ समिति का दायरा बढ़ाकर इसमें दो और विशेषज्ञों-आईआईटी मुम्बई के इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर डी.के. शर्मा तथा आईआईटी कानपुर के कम्प्यूटर साइंस तथा इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर रजत मूना (वर्तमान महानिदेशक सी-डैक) को भी शामिल किया गया.

भारत ई-लोकतंत्र में परिवर्तित

नवम्बर, 1998 के बाद से आम चुनाव/उप-चुनावों में प्रत्येक संसदीय तथा विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र में मेरा इस्तेमाल किया जा रहा है. 2004 के आम चुनाव में देश के सभी मतदान केन्द्रों पर 10.75 लाख ईवीएम के इस्तेमाल के साथ भारत ई-लोकतंत्र में परिवर्तित हो गया. तब से सभी चुनावों में ईवीएम यानी मेरा इस्तेमाल किया जा रहा है.

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मेरी विशेषताएं

अब आप मेरा क्रमिक विकास तो जान ही चुके हैं अब जाते जाते मैं अपनी कुछ विशेश्ताएं भी बताती चलती हूँ.

  • मैं छेड़छाड़ मुक्त हूँ और मेरा संचालन भी काफी सरल है.
  • आप जानते हैं कि नियंत्रण इकाई के कामों को नियंत्रित करने वाले प्रोग्राम “एक बार प्रोग्राम बनाने योग्य आधार पर” माइक्रोचिप में नष्ट कर दिया जाता है. नष्ट होने के बाद इसे पढ़ा नहीं जा सकता, इसकी कॉपी नहीं हो सकती या कोई बदलाव नहीं हो सकता.
  • इवीएम मशीनें यानी मैं अवैध मतों की संभावना कम करती हैं, गणना प्रक्रिया तेज बनाती हैं तथा मुद्रण लागत घटाती हैं.
  • मेरा इस्तेमाल बिना बिजली के भी किया जा सकता है क्योंकि मैं (मशीन) बैट्री से चलती हूँ.
  • एक और बात यदि उम्मीदवारों की संख्या 64 से अधिक नहीं होती तो मेरे ( ईवीएम के) इस्तेमाल से चुनाव कराये जा सकते हैं.
  • आप जानते हैं कि एक ईवीएम मशीन अधिकतम 3840 वोट दर्ज कर सकती है.
  • मेरे इस्तेमाल से जाली मतदान तथा बूथ कब्जा करने की घटनाओं में काफी हद तक कमी लाई जा सकती है.
  • इतना ही निरक्षर लोगों को मेरा इस्तेमाल करने में ज्यादा आसानी होती है और मत पेटिकाओं की तुलना में मुझे दूसरी जगह ले जाने और वापस लाने में काफी आसानी होती है.

लेकिन अब हमारे लोकतंत्र में कुछ ऐसे महानुभाव आज भी विराजमान हैं जो फिर से मत पेटिका का इस्तेमाल करने पर जोर दे रहे हैं. हो भी क्यूँ न अब बूथ कैप्चरिंग जैसे लाभ उन लोगों को जो नहीं मील रहे. अरे जनाब मैं मशीन ज़रूर हूँ लेकिन इतना जान लीजिये मत पेटिका वाले बूथों पर कब्ज़ा जल्दी हो जाता है पर मेरे राज में बूथ कैप्चरिंग जैसी घटनाएं न के बराबर ही है.

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