भारत का शेर कहा जाने वाला पठान

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दिल्ली की सल्तनत पर राज राज करने वाला वह पठान जिसने अपने समयकाल में बहुत से ऐसे कार्य किये ,जिसके फायदे आज आम जनता को भी मिल रहे हैं, उनका नाम था ‘शेरशाह सूरी’  भारत में जन्मा  वह पठान जिसके द्वारा किये गए कार्य इतिहास के पन्नो में हमेशा के लिए लिख दिए गए। जिसने हुमायूँ को  हराकर उत्तर भारत में सूरी साम्राज्य स्थापित किया था। शेरशाह सूरी ऐसा पहला  पठान था जिसने अपने शाशन में अपने साम्राज्य के लिए बहुत काम किया।

शेर खाँ के नाम से जाना जाता था शेऱखान सूरी

वैसे तो शेरशाह सूरी का वास्तविक नाम ‘फ़रीद ख़ाँ’ था, शेरशाह को शेर ख़ाँ के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि उन्होंने कथित तौर पर कम उम्र में अकेले ही एक शेर को मारा था। इनके पिता का नाम हसन खाँ था। इतिहासकारों का कहना है कि शेरशाह अपने समय में अत्यंत दूरदर्शी और विशिष्ट सूझबूझ का आदमी था। इसकी विशेषता इसलिए अधिक उल्लेखनीय है कि वह एक साधारण जागीदार का उपेक्षित बालक था। उसने अपनी वीरता, अदम्य साहस और परिश्रम के बल पर दिल्ली के सिंहासन पर क़ब्ज़ा किया था।

पठान बनने से पहले एक मामूली सैनिक था शेरशाह सूरी

शेरशाह सूरी ने पहले बाबर के लिये एक सैनिक के रूप में काम किया था जिन्होनें उन्हे पदोन्नति कर सेनापति बनाया और फिर बिहार का राज्यपाल नियुक्त किया। जब हुमायूँ कहीं सुदूर अभियान पर थे तब शेरशाह ने बंगाल पर कब्ज़ा कर सूरी वंश स्थापित किया था।

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दो बार हुमायूँ को हराकर अपना राज कायम किया

मुग़ल शाशक हुमायूँ की सेना को दो बार युद्ध में पराजित किया था शेरशाह सूरी ने। शेरशाह ने हुमायूँ को चौसा के युद्ध में हराकर पहले तो दिल्ली पर कब्जा किया और फिर कन्नौज की लड़ाई में फिर दोबारा हुमायूँ को हराया। जिसके चलते हुमायूँ को अपना स्थान छोड़कर भागना पड़ा।

भारत छोड़ने पर मजबूर किया हुमायूँ  को

सन् 1539 में, शेरशाह को चौसा की लड़ाई में हुमायूँ का सामना करना पड़ा जिसे शेरशाह ने जीत लिया। शेरशाह ने हुमायूँ को पुनः हराकर भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया और शेर खान की उपाधि लेकर सम्पूर्ण उत्तर भारत पर अपना साम्रज्य स्थापित कर दिया।

अपने शाशनकाल में रुपया का चलन शुरू किया

अपने शासन के दौरान शेरशाह ने नई नगरीय और सेना प्रशासन की स्थापना की और पहला रुपया जारी किया। भारत की डाक व्यवस्था को पुनः संगठित किया और माना जाता है कि ‘ग्रांड ट्रंक रोड’ का निर्माण भी शेरशाह ने ही किया। ‘ग्रांड ट्रंक रोड’ का निर्माण करवाना शेरशाह सूरी की विलक्षण सोच का प्रतीक है। यह सड़क सदियों से विकास में अहम भूमिका निभा रही है।

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युद्ध में गोले के फटने से चली गयी जान

चंदेल राजपूतों के खिलाफ लड़ते हुए शेरशाह सूरी ने कालिंजर किले की घेराबंदी की थी, जहां ‘उक्का’ नामक आग्नेयास्त्र से निकले गोले के फटने से उनकी मौत हो गयी। माना जाता है कि  शेरशाह ने अपने जीवनकाल में ही अपने मक़बरे का काम शुरु करवा दिया था। उनका मक़बरा एक कृत्रिम झील से घिरा हुआ है। यह मकबरा हिंदू मुस्लिम स्थापत्य शैली का बेजोड़ नमूना है।इतिहासकार के अनुसार “शेरशाह के मकबरे को देखकर ऐसा लगता है कि वह अन्दर से हिंदू और बाहर से मुस्लिम था”।

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