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कौन थी वो भारतीय महिलाएं जिन्होंने अंग्रेजो को लोहे के चने चबवाए

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Written by Shweta Singh

अगर हम भारत में पैदा होने वाली वीरांगनाओं के बारे में बात करते हैं तो हमारे मुख से सबसे पहले रानी लक्ष्मीबाई का नाम ही निकलता है. और निकले भी क्यूँ न … हम सबने सुना है- “बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी.” लेकिन क्या आप जानते हैं की हमारे भारतवर्ष में ऐसी न जाने कितनी वीरांगनाये हैं जिसके बारे में शायद ही किसी को पता हो. तो चलिए आज हम आपको रूबरू करते हैं इतिहास की कुछ ऐसी ही वीरांगनाओं से.

रणचंडी मुन्दर

तो शुरुआत हम झांसी से ही करते हैं. मुन्दर का नाम शायद ही किसी के ज़हन में आया हो, लेकिन आपकी जानकारी के लिए हम आपको बता दें की मुन्दर रानी लक्ष्मीबाई की बाल सखा थी. ये झांसी में स्त्री सेना की कमांडर तथा रानी के रक्षा दल की नायिका थी . मुन्दर ने अंग्रेजों के विरुद्ध सभी युद्धों में रानी लक्ष्मीबाई के अंग-संग की तरह रह कर भीषण युद्ध किया.  घोड़े की लगाम दांतों से कस मुन्दर दोनों हाथों से अंग्रेजो की सेना को गाजर मूली की तरह काटने में महारथी थी. इसलिए इनक एक नाम रणचंडी भी पड़ा. मुन्दर का अंतिम संस्कार लक्ष्मीबाई के साथ ही किया गया था.

झलकारी बाई

झलकारी बाई वीरता की मिसाल और संपूर्ण संसार में त्याग और बलिदान का अनुपम उदाहरण है. झलकारी झाँसी राज्य के एक बहादुर किसान सदोवा सिंह की पुत्री थी. इनके माता-पिता अधिकांश समय प्रायः जंगल में ही काम करने में व्यतीत होता था. जंगलों में रहने के कारण ही झलकारी के पिता ने उसे घुड़सवारी एवं अस्त्र-शस्त्र संचालन की शिक्षा दिलवाई थी. इन्होंने महारानी लक्ष्मीबाई को किले से बाहर निकलवाने में मदद की. इसके बाद हुए भयंकर युद्ध में उन्होंने एक तोपची की भूमिका निभाई और अंततः रणक्षेत्र में शहीद हो गयीं. झलकारी बाई के बारे में ऐसा भी कहा जाता है कि यह रानी लक्ष्मीबाई की हमशकल थी.

महारानी तपस्वनी देवी

ये रानी लक्ष्मीबाई की भतीजी थीं, उनके एक सरदार पेशवा, नारायण राव की पुत्री थीं. क्रान्ति में उन्होंने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उत्तर भारत के सन्यासियों ने गाँव-गाँव घूमकर लालकमल की पहचान छावनियो में सैनिको तक पहुंचाकर उन्हें भावी क्रान्ति के लिए प्रेरित किया. इन सबके पीछे महारानी तपस्वनी की प्रेरणा थी. महारानी का वास्तविक नाम सुनन्दा था. वह बाल विधवा थीं और समकालीन हिन्दू विधवाओं की तरह सुनन्दा किशोर अवस्था से ही तप-संयम का जीवन व्यतीत कर रही थीं. पिता की मृत्यु के बाद जागीर की देखभाल का काम भी उनके कंधो पर आ गया. उन्होंने किले की मरम्मत कराने , सिपाहियों की नई भर्ती करने के लिए तैयारिया शुरू कर दी. अंग्रेजो को उनकी इन गतिविधियों का भेद मिल गया. उन्होंने देवी को पकड़कर त्रिचरापल्ली के किले में नजरबंद कर दिया. वहाँ से छूटते ही देवी सीतापुर के पास निमिषारण्य में रहने चली गयीं और संत गौरीशंकर की शिष्या बन कर वैराग्य धारण कर लिया. युद्ध के समय महारानी  तपस्वनी स्वंय भी घोड़े पर सवार होकर  मुठभेड़ों से जूझते हुए सारी व्यवस्था का निरिक्षण करती थीं. अपने छापामार दस्तों के साथ अंग्रेजो के फौजी -ठिकानों पर हमला भी करती थी. १९०७ में वे पञ्चतत्व में विलीन हो गयीं.

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रानी हिन्डोरिया

दमोह की रियासत के ठाकुर किशोर सिंह और उनकी पत्नी रानी हिन्डोरिया ने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध में भाग लिया. इतना ही नहीं युद्ध में उन्होंने अपने क्षेत्र में स्थित सभी अंग्रेजों को परस्त कर दिया. हालांकि बाद में अंग्रेजों की विशाल आधुनिक सेना ने हिंडोरिया पर विजय प्राप्त कर ली परन्तु रानी ने हार नहीं मानी. वह भी गोरिल्ला वारफेयर का औचित्य जानते हुए अंग्रेजों के लिए परेशानी का सबब बनी रहीं.

ऊदा देवी

अब हम आपको लिए चलते हैं लखनऊ की ओर. लखनऊ के सिकंदरबाग़ में आज भी ऊदा देवी के शौर्य की दास्तान गाहे बगाहे सुनाई डे जाती है. कहते हैं कि ब्रिटिश फ़ौजी सिकंदर बाग़ में घुस कर कब्जा करने की कोशिश कर रहे थे,परन्तु उनके समक्ष ऊदा देवी नामक एक वृहद दीवार थी. उन्होंने अकेले ही घंटों तक अंग्रेजी सेना को रोके रखा . ऊदा देवी ने ब्रिटिश जनरल कूपर व जनरल लैम्सडन सहित कई सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया. अंततः करीब तीन घंटे बाद अंग्रेजों के कई सैनिक दीवार के उस पार जा पाए. इस तरह वीरांगना ऊदा देवी शहीद हो गयी,पर जीतेजी हार नहीं मानी.

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वीरांगना अवन्तिका बाई

डलहौज़ी की हड़प नीति से भारत का कोई भी राज्य अछूता नहीं था. और उसकी इस हड़प नीति का शिकार मध्यप्रदेश के मंडला जिले का रामगढ़ भी हुआ. रानी अवन्तिकाबाई की इच्छा के विपरीत वहाँ एक तहसीलदार नियुक्त किया गया ओर राजपरिवार को पेन्शन दे दी गई. 1857 की क्रांति की आग की ज्वाला रामगढ़ का रुख भी कर चुकी थी. 1858 में अंग्रेजो ने रामगढ़ पर हमला कर दिया. अवन्तिकाबाई डरी नहीं बल्कि उन्होंने अपने हाथों में तलवार उठा ली. युद्ध इतना ज़बरदस्त था कि अंग्रेज अफसर वाशिंगटन को वहां से अपनी जान बचाकर भागना पड़ा.  वाशिंगटन ने अधिक सैन्य बल के साथ पुन: रामगढ़ पर आक्रमण किया. इस बार भी अवन्तिका बाई ने  और उनके बहादुर सैनिकों ने अंग्रेजों से जमकर मुकाबला किया. पर अंग्रेज कब्जा करने में कामयाब रहे. लेकिन अवंतिका बाई ने हार नहीं मानी बल्कि जंगलों से ही गोरिल्ला युद्ध का आगाज़ किया. अंततः अंग्रेजों के हाथों मरने से बेहतर उन्होंने खुद की जान लेना उचित समझा और अपने सीने में कटार घोंप कर खुद को मौत की नींद सुला दिया.

ऐसी और न जाने कितनी ही वीरांगनाएं हमारे भारतवर्ष में होंगी जिनका ज़िक्र इतिहास में नहीं हैं. लेकिन हम उनके देशभक्ति के इस जज्बे के प्रति नतमस्तक हैं जिस वजह से भारत आज एक आज़ाद देश बन पाया है. इतना ही नहीं भारत की आजादी को लेकर ही सही बिना किसी लिंग भेदभाव के स्त्री हो या पुरुष सबने भारत की आजादी में सहयोग दिया.

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