अगर हत्या न होती तो भारत का इतिहास बदल सकती थी रज़िया सुल्तान

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दिल्ली सल्तनत पर राज करने वाले बहुत से पुरुष शाशक हुए, लेकिन  भारतीय इतिहास में पहली महिला शाशक भी थी जिसने दिल्ली सल्तनत को संभाला।  ‘रज़िया सुल्तान’  एक ऐसा नाम जो  इतिहास के पन्नो में अमर  है, लेकिन आज भी लोग रज़िया सुल्तान की  कहानी से ज्यादा वाकिफ नही है।  भारत की पहली महिला  शासक जिसने दिल्ली सल्तनत पर लगभग 5 साल तक राज किया। आइये जानते हैं रज़िया सुल्तान की कहानी।

रज़िया सुल्तान का परिचय

रज़िया सुल्तान मुस्लिम इतिहास की पहली महिला शाशक थी। रज़िया का शाही नाम ‘जलॉलात उद-दिन रज़ियॉ’ , इतिहास में जिसे सामान्यत ‘रज़िया सुल्तान’ या ‘रज़िया सुल्ताना’ के नाम से जाना जाता है जो की इल्तुतमिश की पुत्री थी। तुर्की मूल की रज़िया को अन्य मुस्लिम राजकुमारियों की तरह सेना का नेतृत्व तथा प्रशासन के कार्यों में अभ्यास कराया गया, ताकि ज़रुरत पड़ने पर उसका इस्तेमाल किया जा सके।

इल्तुतमिश के बाद गद्दी  पर बैठा  उसका छोटा बेटा

मुस्लिम समुदाय के लोगों  को इल्तुतमिश का किसी महिला को वारिस बनाना जरा भी मंजूर नही था, इसलिए उसकी मृत्यु के बाद पहले उसके छोटे बेटे ‘रक्नुद्दीन फ़िरोज़ शाह’ को राजसिंहासन पर बैठाया गया। रक्नुद्दीन, का शासन बहुत कम समय के लिये था, इल्तुतमिश की विधवा, शाह तुर्कान का शासन पर नियंत्रण नहीं था।

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अयोग्य शाशक था रक्नुद्दीन

लापरवाह रक्नुद्दीन के खिलाफ जनता में इस सीमा तक आक्रोश उमड़ा तथा रक्नुद्दीन और  उसकी माता शाह तुर्कान की हत्या कर दी गयी। उसका शासन मात्र  6 माह का था। इसके पश्चात सुल्तान के लिए अन्य किसी विकल्प के अभाव में मुसलमानों को एक महिला को शासन की बागडोर देनी पड़ी। और रज़िया सुल्तान दिल्ली की शासिका बन गई।

रज़िया ने संभाली बागडोर

शासन कार्यों में रज़िया  की रुचि अपने पिता के शासन के समय से ही थी। गद्दी संभालने के बाद रज़िया ने रीतिरिवाज़ों के विपरीत पुरुषों की तरह सैनिकों का कोट और पगडी पहनना पसंद किया। बल्कि, बाद में युद्ध में बिना नकाब पहने शामिल हुई। रज़िया ने पर्दा प्रथा का त्याग कर पुरषों कि तरह चोगा (काबा) कुलाह (टोपी) पहनकर दरबार में खुले मुंह जाने लगी।

रज़िया  ने मुश्किल परिस्थिति में संभाला था दिल्ली सल्तनत को

रज़िया सुलतान का पूरा कार्यकाल संघर्षो में ही बीता था। जिस समय रज़िया के पिता इल्तुतमिश ने रज़िया को गद्दी पर बैठाया, उस वक़्त रजिया के चारो तरफ हालात बहुत ज्यादा ही बिगड़े हुए थे। दिल्ली सल्तनत के अमीर तथा दरबारियो को यह बात बिलकुल भी पसंद नही आयी के उनके ऊपर किसी महिला शाशक राज करे। और वह रज़िया के खिलाफ खड़े होने लगे।

महिला होने ने उससे उसका प्यार ,सत्ता तथा ज़िन्दगी भी छीन ली

रज़िया अपनी राजनीतिक समझदारी और चतुराई से सेना तथा जनसाधारण का ध्यान रखती थी। वह दिल्ली की सबसे शक्तिशाली शासक बन गयीं थी, लेकिन रज़िया के जीवन काल  में बड़ा मोड़ तब आया जब रज़िया और उसके सलाहकार ‘जमात-उद-दिन-याकुत’ (एक हब्शी) के बीच नजदीकियां बढ़ने  लगी और  मुसलमानों को यह बात पसंद  नहीं आई।

 

रज़िया और याकुत प्रेमी थे

लेकिन रज़िया ने इस पर ध्यान नहीं दिया। किंतु उसका इस सम्बन्ध के परिणाम को कम आंकना अपने राज्य के लिये घातक सिद्ध हुआ। रज़िया और याकुत प्रेमी थे। इन सभी परिस्थितियों में  रज़िया ने तुर्की वर्ग में अपने प्रति ईष्या को जन्म दे दिया था, क्योंकि याकुब तुर्क नहीं था और उसे रज़िया ने अश्वशाला का अधिकारी नियुक्त कर दिया था।

भटिंडा के राज्यपाल ‘मल्लिक इख्तियार-उद-दिन-अल्तुनिया’ ने अलग-अलग राज्यो के राज्यपालों जिन्हें रज़िया का शाशन नामंजूर था, उनके साथ मिलकर रज़िया के खिलाफ विद्रोह कर दिया।

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जाटो से हुए संघर्ष में मारी गयी रज़िया सुलतान

रज़िया और अल्तुनिया के बीच युद्ध हुआ जिसमें याकुत मारा गया और रज़िया को बंदी बना लिया गया। मरने के डर से रज़िया अल्तुनिया से शादी करने को तैयार हो गयी। इस बीच, रज़िया के भाई, मैज़ुद्दीन बेहराम शाह ने सिंहासन हथिया लिया। अपनी सल्तनत की वापसी के लिये रज़िया और उसके पति, अल्तुनिया ने बेहराम शाह से युद्ध किया, जिसमें उनकी हार हुई।

उन्हें दिल्ली छोड़कर भागना पड़ा और अगले दिन वो कैथल पंहुचे, जहां उनकी सेना ने साथ छोड़ दिया। वहां जाटों से हुए संघर्ष में दोनों मारे गये।

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