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मैं नहीं होऊंगा लेकिन ‘द शो मस्ट गो ऑन’- रीगल सिनेमा

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Written by Shweta Singh

आज मुझे ठीक वैसा ही महसूस हो रहा है जैसा 85 साल पहले हो रहा था. आज भी मेरे यहाँ इतनी भीड़ थी जितनी मेरी पहली फिल्म की स्क्रीनिंग के दौरान थी. जी हाँ मैं हूँ दिल्ली का रीगल सिनेमा. मैंने अपने यहाँ आज़ादी से पहले से लेकर आजादी के बाद तक के दौर को देखा है. मेरा कारवां जहाँ स्टेज शो से शुरु हुआ वो ब्लैक एंड वाइट चलचित्रों से होता हुआ कलर्ड फिल्मों तक पहुंचा.

मुझे जब से बनाया गया मैंने बॉलीवुड के इतिहास पर नज़र रखी, वर्तमान में चल रही फिल्मों और उनकी कंट्रोवर्सी तक पर नज़र रखी. मेरे परदे पर दिखाई जाने वाली फिल्मों के लिए प्रोजेक्टरस और उनके कमरों को मैंने डिजिटल होते हुए देखा है. पर अब मेरा समय समाप्त हो गया है. आप कह सकते हैं की मेरा पर्दा गिरने वाला है. लेकिन आप लोगों को अलविदा कहने से पहले मैं आपको अपने इतिहास से रूबरू कराना चाहता हूँ. तो चलिए मैं आपको लिए चलता हूँ अपनी दुनिया में.

मैं नयी दिल्ली का पहला सिनेमा घर

सिनेमाघर के रूप में मेरी शुरुआत १९३२ में हुई थी. मैं नयी दिल्ली का पहला सिमेनाघर था. जब नयी दिल्ली का निर्माण शुरू हुआ और उसी क्रम में कनाट प्लेस और मेरा भी निर्माण हुआ. मुझे नाम दिया गया रीगल न्यू डेल्ही प्रीमियर थिएटर . आप कह सकते हैं कि नयी दिल्ली और मैंने संसार में एक साथ कदम रखा.

लार्ड माउंटबेटन की था मैं पहली पसंद

पुरानी दिल्ली में तो पहले भी कई सिनेमाहाल थे लेकिन नयी दिल्ली मैं पहला सिनेमाघर था. और उस समय मेरे परदे पर फिल्में नहीं बल्कि अंग्रेजी नाटकों का बोलबाला हुआ करता था. देखिये यहाँ आज भी नाटकों का स्टेज है . मैं लार्ड माउंटबेटन की पहली पसंद था. वह अपनी पत्नी के साथ मेरे पास कई अंग्रेजी नाटकों का लुत्फ़ उठाने आते थे.

ये थी मेरी पहली फिल्म

१९३९ में मेरे परदे पर पहली फिल्म लगी. फिल्म का नाम था गॉन विद द विंड. ये अंग्रेजी फिल्म थी। अब मेरे पास लोग नाटकों के साथ साथ फिल्में देखने भी आने लगे. देश के पहले राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद और प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु ने कई फिल्में देखी. मुझे याद है जब पंडित नेहरु ने मेरे यहाँ आकर १९५६ में ‘चलो दिल्ली’ नाम की फिल्म देखी थी।

मेरी यह खासियत थी लोगों को पसंद

मैं बड़ी हस्तियों की ही नहीं बल्कि आम लोगों की भी पहली पसंद था. जब भी कोई नयी फिल्म लगती सब मेरे पास चले आते. मेरे यहाँ 650 सीटें थी मेरी खासियत यह थी कि यहाँ कई बॉक्स हैं जिसमें परिवार और मित्रों के साथ आप मजे से फिल्म का आनंद ले सकते थे. एक समय था जब यहाँ हाउसफुल का बोर्ड हटता नहीं था लेकिन आज मैं दर्शकों के लिए तरस रहा हूँ.

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राज कपूर से था मेरा ख़ास रिश्ता

हिन्दी फिल्मों के शो-मैन राजकपूर का तो मेरे साथ काफी गहरा सम्बन्ध रहा. यहाँ उनकी बहुत सी फिल्में रिलीज़ हुईं. इनमे से कुछ के नाम तो अभी भी मेरी जुबां पर है. बॉबी, जागते रहो, बूट पोलिश और उनकी आखिरी फिल्म थी सत्यम शिवम् सुन्दरम.

राजकपूर के अलावा वी. शांताराम की भी मैं पहली पसंद था. इसलिए उनकी दहेज(१९५०) तथा दो आंखें बारह हाथ(१९५८) भी मेरे यहाँ ही रिलीज़ हुयी. इसके अतरिक्त कागज के फूल (१९५९) और मदर इंडिया (१९५९ ) जैसी बड़ी फिल्मो की रिलीज़ भी मैंने अपनी आँखों से देखी.

वाल्टर जॉर्ज थे मेरे निर्माता

वाल्टर जॉर्ज नयी दिल्ली के निर्माण के दौर में भारत आये थे और उन्होंने मेरा निर्माण किया. जॉर्ज ने मेरे निर्माण के दौरान ऊपर की और एक रेस्टोरेंट का स्पेस दिया ताकि लोग फिल्म या नाटक देखने के बाद रेस्टोरेंट में बैठकर कॉफ़ी और नाश्ते का आनंद भी ले सकें. जॉर्ज का १९६१ में निधन हो गया. लेकिन वह मेरे अलावा सेंट स्टीफंस कालेज और सुजान सिंह पार्क जैसी बेहतरीन विरासत दिल्ली को दे गए.

लेकिन यह विरासत यानी कि मैं अब हमेशा के लिए सोने वाला हूँ. आज मेरा आखिरी शो देखने कई लोग आये. कुछ अपनी पुरानी यादें ताज़ा करने, कुछ अपने बीते पलों को दोबारा जीने और कुछ मुझे भावभीनी विदाई देने. आज राजकपूर की फिल्में मेरा नाम जोकर और संगम के बाद मेरा पर्दा बंद कर दिया गया. अब मेरी जगह यहाँ कोई और ले लेगा. मैं भी राजकपूर की फिल्म मेरा नाम जोकर की यह लाइन बोलकर आप से विदा लूँगा. “बाबू ये दुनिया एक तीन घंटे का सर्कस है. पहला बचपन, दूसरा जवानी और तीसरा बुढ़ापा… फिर जीवन ख़त्म लेकिन शो मस्ट गो ऑन”.

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