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भारतीय इतिहास का प्रसिद्ध ऐसा युद्ध जो जल एवं थल दोनों पर लड़ा गया

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Written by Rahul Ashiwal

वैसे तो भारत  की इस सरज़मी ने न जाने कितने ही युद्ध देंखे हैं, लेकिन  भारतीय इतिहास में लड़े गये प्रसिद्ध युद्धों में से एक था ‘घाघरा का युद्ध’। घाघरा युद्ध की यह विशेषता थी कि यह जल एवं थल दोनों पर लड़ा गया था।  यह युद्ध 6 मई, 1529 ई. को मुग़ल बादशाह बाबर और अफ़ग़ानों के मध्य लड़ा गया। युद्ध में बाबर ने महमूद लोदी के नेतृत्व में लड़ रहे अफ़ग़ानों को करारी शिकस्त दी, जिससे लोदियों की सारी आशाएं टूट गयी थी। बाबर ने ‘घाघरा के युद्ध’ में बंगाल एवं बिहार की संयुक्त सेनाओं को परास्त किया।

क्यों हुआ घाघरा का युद्ध

दरअसल बाबर कि कई विजयों के बाद भी अफ़ग़ानों के ऊपद्रवों का अंत नहीं हुआ था।  इब्राहिम लोदी के भाई महमूद लोदी ने बिहार को जीत लिया था और पूर्वी प्रदेशों के एक बड़े भाग ने उसका साथ दिया था। बाबर ने इस विद्रोही के विरुद्ध एक सेना के साथ अपने पुत्र अस्करी को भेजा और पीछे स्वयं भी गया।

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अफगान सरदारों ने की बाबर की अधीनता स्वीकार

इस सूचना को सुनकर की बाबर आ रहा है शत्रु तितर-बितर हो गए। जब बाबर इलाहाबाद चुनार और बनारस होते हुए बक्सर जा रहा था तब बहुत से अफगान सरदारों ने उसकी अधीनता स्वीकार की, अपने प्रधान सहयोगियों द्वारा साथ छोड़ने के बाद  महमूद ने बंगाल में शरण ली। लेकिन बंगाल का शासक ‘नुसरतशाह’ भी बाबर से मिल गया था, लेकिन उसकी सेनाओं ने भागे हुए अफगान विद्रोहियों को शरण दी थी।

घाघरा का युद्ध जीता बाबर

इसके बाद बाबर बंगाल की ओर बढ़ा, उसने अफगानों को 6 मई 1529 को घाघरा की प्रसिद्ध लड़ाई में पराजित किया, बाबर की विजय ने लोदियों की बची खुशी आशा को भी खत्म कर  दिया और कई प्रधान अफगान सरदारों ने बाबर की अधीनता स्वीकार कर ली।

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जल एवं थल दोनों पर लड़ा गया यह युद्ध

यह युद्ध जल एवं थल दोनों पर लड़ा गया था। घाघरा युद्ध के बाद बाबर ने बंगाल के शासक नुसरतशाह से संधि कर उसके साम्राज्य की संप्रभुता को स्वीकार किया। नुसरतशाह ने बाबर को आश्वासन दिया कि वह बाबर के शत्रुओं को अपने साम्राज्य में शरण नहीं देगा।

घाघरा युद्ध के परिणामस्वरूप बाबर का साम्राज्य ऑक्सस से घाघरा एवं हिमालय से ग्वालियर तक पहुँच गया। इस युद्ध के लगभग डेढ़ वर्ष बाद ही बीमारी के कारण 26 दिसम्बर, 1530 को बाबर की मृत्यु हो गई।

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