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‘आज़ाद हिन्द फ़ौज’ की नींव रखने वाले रासबिहारी बोस के अनसुने किस्से

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Written by Rahul Ashiwal

ऐसे बहुत से क्रांतिकारियों के बारे में तो आपने  सुना ही होगा, जिन्होंने  भारत को आजादी दिलाने के लिए जी-जान लगा दिया। घर-बार छोड़ कर, सारी  सुख-सुविधाओं का त्याग कर के दर-दर की ठोकरें खाना स्वीकार किया और  ये सब किया सिर्फ अपनी मातृभूमि को आज़ादी दिलाने के लिए। उन्हीं में से एक नाम था रासबिहारी बोस  का जो भारत के एक ऐसे क्रान्तिकारी नेता थे, जिन्होने ब्रिटिश साम्राज्य  के विरुद्ध ‘गदर षडयंत्र’ और ‘आजाद हिन्द फौज’ के संगठन का निर्माण किया।

रासबिहारी बोस ने न केवल भारत में कई क्रान्तिकारी गतिविधियों का संचालन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी, बल्कि विदेश में रहकर भी वह भारत को स्वतन्त्रता दिलाने में जी-तोड़ प्रयास किये, और कई अंग्रेज विरोधी गतिविधियां करते रहे। रासबिहारी बोस ने एक तरह से देश की आज़ादी के लिए निर्वासित जीवन जिया।

बचपन से ही देखा आज़ादी का सपना

रासबिहारी बोस का जन्म बंगाल में बर्धमान जिले के सुबालदह गांव  में हुआ था। इन्होंने अपनी शिक्षा चन्दन नगर में पूरी की, जहाँ  उनके पिता ‘विनोद बिहारी बोस’ अध्यापक नियुक्त थे।रासबिहारी बोस बचपन से ही देश की स्वतन्त्रता के सपने देखा करते थे और क्रान्तिकारी गतिविधियों में उनकी गहरी दिलचस्पी थी। प्रारम्भ में रासबिहारी बोस ने देहरादून के वन अनुसंधान संस्थान में कुछ समय तक हेड क्लर्क के रूप में काम किया।

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जुड़ गए बंगाल के क्रान्तिकारियों के साथ

उसी दौरान उनका क्रान्तिकारी ‘जतिन मुखर्जी’ की अगुआई वाले ‘युगान्तर’ नामक क्रान्तिकारी संगठन के ‘अमरेन्द्र चटर्जी’ से परिचय हुआ और वह बंगाल के क्रान्तिकारियों के साथ जुड़ गये। बाद में वह ‘अरबिंदो घोष’ के राजनीतिक शिष्य रहे ‘जतीन्द्रनाथ बनर्जी’ उर्फ ‘निरालम्ब स्वामी’ के सम्पर्क में आने पर संयुक्त प्रान्त और पंजाब के प्रमुख आर्य समाजी क्रान्तिकारियों के निकट आये।

दिल्ली में वायसराय लार्ड हार्डिंग के खिलाफ रचा षड़यंत्र

दिल्ली में ‘जार्ज पंचम’ के बाद जब वायसराय ‘लॉर्ड हार्डिंग’ की दिल्ली में सवारी निकाली जा रही थी तो उसकी शोभायात्रा पर बम फेंकने की योजना बनाने में रासबिहारी की प्रमुख भूमिका रही। इसके बाद ब्रिटिश पुलिस रासबिहारी बोस के पीछे लग गयी और वह बचने के लिये रातों-रात रेलगाडी से देहरादून चले गए  और ऑफिस में इस तरह काम करने लगे मानो कुछ हुआ ही नहीं हो।

फिर से क्रान्तिकारी गतिविधियों के में जुट गये

अगले दिन उन्होंने देहरादून के नागरिकों की एक सभा बुलायी, जिसमें उन्होंने वायसराय पर हुए हमले की निन्दा भी की। इस प्रकार उन पर इस षडयन्त्र और काण्ड का प्रमुख सरगना होने का किंचितमात्र भी सन्देह किसी को न हुआ।बंगाल में बाढ़ राहत कार्य के दौरान रासबिहारी बोस ‘जतिन मुखर्जी’ के सम्पर्क में आये, जिन्होंने उनमें नया जोश भरने का काम किया। रासबिहारी बोस इसके बाद दोगुने उत्साह के साथ फिर से क्रान्तिकारी गतिविधियों के में जुट गये।

सबसे पहले आज़ाद हिन्द फ़ौज की स्थापना रासबिहारी बोस ने ही की

कम  ही लोग ये बात जानते हैं कि ‘प्रथम आज़ाद हिन्द फ़ौज’ का गठन सबसे पहले रासबिहारी बॉस ने ही किया। इस सेना के प्रधान ‘मोहन सिंह’ थे। इसी संगठन के आधार पर बाद में नेता जी ‘सुभाषाचंद्र बोस’ ने द्वितीय आज़ाद हिन्द फ़ौज का गठन किया।

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आजादी के किये प्रयास तो बहुत पर नही हो पाए सफल

रासबिहारी बोस भारत की आजादी के मुकाम पर पहुचने ही वाले थे कि जापानी सैन्य कमान ने उन्हें और जनरल मोहन सिंह को आई०एन०ए० के नेतृत्व से हटा दिया। हालांकि बाद में रासबिहारी बोस के बाद सुभाषचंद्र बोस को आजाद हिन्द फ़ौज की कमान सोप दी गयी थी। भारत को ब्रिटिश शासन की गुलामी से आजादी  दिलाने की जी-तोड़ मेहनत की  किन्तु इसकी आस लिये हुए 21 जनवरी 1945  को इनका निधन हो गया।

उनके निधन से कुछ समय पहले जापानी सरकार ने उन्हें आर्डर ऑफ द राइजिंग सन के सम्मान से अलंकृत भी किया था। देश को स्वतन्त्र कराने के लिये किये गये उनके द्वारा ये प्रयास सफल नहीं हो पाये, लेकिन आज भी स्वतन्त्रता संग्राम में उनकी भूमिका का महत्व बहुत ऊँचा है।

रासबिहारी बोस देश के स्वातंत्रयवीरों में भारत को आजादी दिलाने में सबसे आगे थे। क्रांतिकारी आंदोलन द्वारा भारत कोआजादी दिलाने में रास बिहारी बोस ने जो भूमिका निभायी उन्हें इतिहास में कभी नही भुलाया जा सकता।

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