कुछ ऐसे जीव जो धरती से हो जायंगे बहुत जल्द विलुप्त

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प्राकृतिक चक्र एक ऐसा चक्र जिसमे जन्म लेने के साथ उसके अंत का दिन भी कभी न कभी निश्चित होता ही है फिर चाहे  वह मानव हो या जीव जंतु। लेकिन दुनिया में मानव खुद की असीमित आव्यशक्ताओ तथा जरूरतों को पूरा करने के लिए ऐसे कदम उठा रहा है जिससे प्राकृति को दिन दिन भर नुक्सान होता जा रहा है। जिस प्राकृति में जीव जन्तुओ आदि से इसकी सुंदरता बढ़ती है दरअसल हम इन्हें ही खत्म करते जा रहे है। जैसे दुनियां में धीरे-धीरे खत्म हो रही जंगली जानवरों की प्रजाति चिंता का विषय है। दुनिया में कई ऐसे जानवर हैं, जिनके संरक्षण को लेकर कोई कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। इस कारण इनकी संख्या में निरंतर कम होती जा रही है। एक समय ऐसा आएगा जब दुनिया में इन जानवरों के नाम भी लोगों को याद नहीं रहेंगे।

उत्तरी राइट व्हेल

यह ह्वेल की सबसे दुर्लभ प्रजाति है। अटलांटिक महासागर में इनकी कुल संख्या 350 से भी कम है। तेल के लिए लगातार किए गए शिकार के चलते यह प्रजाति अंत तक आ गई है। इसके नाम में ‘राइट’ इस लिए आता है क्योंकि शुरुआती समय में इनके शिकार को सही माना जाता था। लंबे समय तक उत्तरी राइट व्हेल मछलियों का भारी संख्या में शिकार किया जाता रहा। इस कारण व्हेल मछलियों की संख्या बेहद कम हो गई है। उत्तरी राइट व्हेल मछली अब विलुप्त होती जा रही है।

अमूर तेंदुए

तेंदुए की यह प्रजाती बेहद दुर्लभ है, जो पूर्वी रूस के दूर और बर्फीले जंगलों में पाए जाते हैं। पहले ये कोरिया और चीन में भी पाए जाते थे। 2007 में इनकी कुल संख्या 20 के आस-पास थी। मानव विकास गतिविधियों और मौसम में बदलाव के कारण इन्हें काफी नुकसान पहुंचा। अमूर तेंदुआ इनकी संख्या इतनी कम हो गई हैं, कि आप इन्हें अपनी ऊंगुलियों से गिन सकते हैं। बीसवीं सदी में अमूर तेंदुए का नाम लुप्त प्राय पशुओं की उस लाल पुस्तिका में शामिल कर लिया गया है, जिसे प्रकृति संरक्षण संबंधी अंतरराष्ट्रीय संघ की लाल किताब कहा जाता है।

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जावन राइनोसेरस (गैंडा)

यह गैंडे के सबसे दुर्लभ प्रजाती है। इंडोनेशिया के जावा द्वीप के पश्चिमी छोर पर मिलने वाले यह जीव संख्या में करीब 50 ही हैं। दलदल और पानी वाली जगहों में दिखने वाले ये गैंडे पहले पूरे दक्षिण एशिया में पाए जाते थे। लेकिन औषधि के लिए किए गए शिकारों के चलते इनकी संख्या घटती रही।

उत्तरी स्पोर टिव लेमूर (बंदर)

बंदर की यह प्रजाति दक्षिणपूर्वी अफ्रीका के मेडागास्कर द्वीप पर पाई जाती है। धनाधन जंगलों की कटाई और गैरकानूनी शिकार के चलते इन पर खतरा मंडरा रहा है। 20 से भी कम संख्या वाले यह वंदर हमेंशा ही खतरे में रहे हैं। इनकी खास बात यह है कि इनका वजन 2 पाउंड से भी कम होता है और अपनी बड़ी आंखो से रात में दूर तक देख सकता है।

आइवरी बिल्ड वुडपैकर (कठफोड़वा)

थोडा बहुत तो आपने कठफोडवे के बारे में सुना और किताबों में पढा ही होगा। चित्र भी देखे होंगे और अगर आप पेडों से घिरे शान्त इलाके में रहतो हो तो कठफोडवे को देखा भी होगा। यह प्राणी अमेरिका के दक्षिणपूर्व और क्यूबा में पाया जाता है।  2004 में इसे विलुप्त मान लिया गया लेकिन कुछ जगहों पर ये फिर देखे गए। हालांकि इसके अस्तित्व के पुख्ता प्रमाण नहीं है, लेकिन माना जाता है कि इस प्रजाति के चुनिंदा पक्षी ही बचे हैं। पंखो के  लिए शिकार किए जाने के कारण यह इस कगार में पहुँचे हैं।

पश्चिमी लोलैंड गोरिल्ला

पश्चिमी अफ्रीका में पाए जाने के कारण इसका नाम पश्चिमी लोलैंड गोरिल्ला है। पिछले 20 सालों में इनकी संख्या 80 फीसदी घट चुकी है। शिकार के इनके विलोपन का सबसे बड़ा कारण नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि इनका विनाश खतरनाक ‘इबोला’ की वजह से हो रहा है।

एशियाई यूनिकॉर्न

लाओस और वियतनाम में पाए जाने वाले इस युनिकोर्न की संख्या 100 से भी कम बची है। मृग की तरह दिखने वाला साओला मीटर उंचा और 100 किलो तक भारी होता है। इसको अंतिम बार कैमरें में रिकार्ड 2013 में किया गया था।

लेदरबैक सी कछुए

पृथ्वी पर पाए जाने सबसे बड़े कछुए की यह प्रजाति दुनिया भर के समुद्री इलाकों में पाई जाती है। 20 साल पहले इनकी संख्या 1 लाख से ऊपर थी, जो अब घट कर 15 हजार ही रह गई है। बीच कल्चर और समुद्री पानी में गंदगी के कारण इन्हें नुकसान हुआ है।

साइबेरिया का बाघ

वैसे तो बाघ की सभी प्रजातिया खतरे में हैं लेकिन साइबेरियाई बाघ दुनिया की सबसे बड़ा बाघ है। पूर्वी रूस, चीन और कोरिया के बर्फीले इलाके में पाए जाने वाले इस बाघ का वजन करीब 300 किलो होता है। ये बर्फीले इलाकों में रहना पसंद करते हैं, जहां तापमान -45 से कम हो। अभी इनकी संख्या 500 से भी कम है।

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चीनी विशालकाय सालमेंडर

यह दुनिया का सबसे बड़ा उभयचर (Amphibian) है जो 6 फुट तक बढ़ सकता हैं। मध्य और दक्षिणी चीन के पहाड़ी जंगलों में इसे देखा जा सकता है। हालांकि यह एक बार में 500 से अधिक अंडे देता है लेकिन इसकी अंडे और मास भोजन के रूप में बहुत ज्यादा प्रयोग होने के कारण यह लगभग विलुप्त हो चुका है।

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