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‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ के पीछे कुछ और ही था इंदिरा गांधी का मकसद

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Written by Rahul Ashiwal

किसी दुश्मन देश से अपनी मातृभूमी की रक्षा करने में एक अलग ही फक्र महसूस होता है, लेकिन क्या हो जब जंग अपने ही लोगों के खिलाफ हो और दोनों तरफ अपने ही लोगों की लाशें पड़ी हो। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर को अलगाववादियों से आज़ाद कराने के लिए चलाए गए ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ के बारे में तो आपने सुना ही होगा, इस ऑपरेशन में 492 नागरिकों की जानें गई और सेना के चार ऑफिसर सहित 83 जवान शहीद हुए थे। इतना ही नहीं इंदिरा गांधी की हत्या हो या सिख विरोधी दंगे इनकी जड़ें इस ऑपरेशन से ही जुड़ी थी। लेकिन आज हम आपको बताएंगे इस ऑपरेशन से जुड़ी हकीकत के बारे में…

कुछ ऐसे होनी थी कार्रवाई

दरअसल सिख इस नरसंहार के लिए इंदिरा गांधी को दोषी मानते थे और इसी के चलते उनकी हत्या कर दी गई, लेकिन आपको बता दें भारतीय सेना का मकसद कुछ और ही था। उनके अनुसार ऑपरेशन ‘सनडाउन’ के तहत हेलिकॉप्टर के जरिए कमांडोज को ‘गोल्डन टैम्पल’ के पास स्थित गुरुनानक निवास गेस्ट हाउस में उतारा जाना था, क्योंकि उस वक्त ‘जरनैल सिंह भिंडरावाले’ यहीं रहता था। इसे ऑपरेशन ‘सनडाउन’ नाम इसलिए दिया गया था, क्योंकि सारी कार्रवाई आधी रात के बाद होनी थी।

दरअसल सेना किसी को भी नुकसान नहीं पंहुचाना चाहती थी। आपको बता दें इस ऑपरेशन के पीछे का मकसद तो भिंडरावाले के अपहरण की योजना थी और भारतीय खुफ़िया एजेंसी ‘रिसर्च एंड एनालिसिस विंग’ (रॉ) की सशस्त्र टुकड़ी द्वारा इस कार्यवायी को अंजाम दिया जाना था। इस ऑपरेशन की सारी तैयारियां हो चुकी थी और इस पर सीधे प्रधानमंत्री ‘इंदिरा गांधी’ अपनी नज़रे बनाई थी, पल-पल की रिपोर्ट उनके पास भेजी जा रही थी।

कौन था जरनैल सिंह भिंडरावाला


ये ऑपरेशन करने की जो सबसे बड़ी वजह था वह था ‘जरनैल सिंह भिंडरावाला’  जो की सिखों की धार्मिक संस्था ‘दमदली टकसाल’ का लीडर था। भिंडरावाला की कट्टर विचारधारा ने लोगों पर गहरा असर डाला था और इसीलिए उसे संस्था की कमान सौंपी गई थी।  वो बेहद कट्टर विचारधारा का था और 1983 से वह हथियारबंद साथियों के साथ यहीं रहने लगा। दरअसल भिंडरावाले ने गोल्डन टैम्पल परिसर में बने अकाल तख्त को अपना मुख्यालय बना लिया था। उसके समर्थकों से गोल्डन टैम्पल को आज़ाद कराने के लिए ही ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ शुरू किया था।

खालिस्तान आंदोलन से जुड़ी ऑपरेशन की जड़ें

भारत में भी एक ऐसा दौर आया जब सिख अपने आप को हिन्दुस्तान से अलग मानने लगे। दरअसल 1970 के दशक में भारत विरोधी ताकतों ने सिखों के मन में यह बात बैठा दी कि हिंदू उनका शोषण कर रहे हैं। पाकिस्तान के तर्ज पर सिख अपने लिए एक अलग राष्ट्र ‘खालिस्तान’ की मांग करने लगे।

दरअसल ‘शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी’ का राजनीतिक संगठन ‘अकाली दल’ सिखों के लिए भारत सरकार से कुछ विशेष रियायतें चाहता था और इसी के लिए 1973 फिर 1978 में आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पारित किया गया। लेकिन धीरे-धीरे उनकी मांगे बढ़ती गई और कहा जाता है कि अकालियों के इस रवैए पर अंकुश लगाने के लिए तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने सिखों के धार्मिक समूह दमदमी टकसाल के प्रमुख जरनैल सिंह भिंडरावाले का परोक्ष रूप से समर्थन किया। लेकिन धीरे-धीरे जरनैल सिंह की राजनीतिक महत्वाकांक्षा बढ़ने लगी तो सरकार ने उसके सिर से अपना हाथ हटा लिया और उसके विरोध में आ गई। तो हम कह सकते हैं कि कहीं ना कहीं ऑपरेशन ब्लू स्टार की जड़े खालिस्तान आंदोलन से जुड़ी हुई थी।

सरकार के इस रवैए से खफ़ा होकर जरनैल सिंह ने सरकार के खिलाफ़ मोर्चा खोल दिया। 80 का दशक आते-आते यह सशस्त्र आंदोलन में बदल गया, जिसे खालिस्तान आंदोलन नाम दिया गया। इस उग्र आंदोलन के समर्थक अपने लिए एक पृथक सिख राष्ट्र की मांग करने लगे। अकाली दल के सदस्य भी सिखों के हितों को लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने लगे। इस आंदोलन ने धीरे-धीरे एक विकराल रूप धारण कर लिया और ये सरकार के लिए एक चुनौती के साथ-साथ एक राष्ट्रव्यापी समस्या बन गई।

फिर हुई ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ की शुरुआत

03 जून 1984
03 जून 1984 के दिन हरमिंदर साहब के आस-पास तैनात किए गए ‘केंद्रीय रिज़र्व फोर्स’ के जवानों से शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) के कुछ सेवादारों की झड़प हो गई। इसके बाद इलाके में तनाव काफी बढ़ गया और इसे देखते हुए शाम तक पूरे इलाके में कर्फ्यू लगा दिया गया। इतना ही नहीं पैरा-मिलिट्री फोर्स के जवानों ने हालात पर काबू करने के लिए जगह-जगह फ्लैग मार्च निकाला। वहां युद्ध जैसे माहौल बन गए, लेकिन इस बार ये जंग दुश्मनों से नहीं बल्कि अपने ही लोगों से थी।

04 जून 1984
माहौल खराब था और 5 जून को गुरु अर्जुन देव का शहीदी दिवस था, इसलिए मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की भीड़ जमा होने लगी थी। दूसरी और सेना हरमिंदर साहिब को आतंकियों से मुक्त कराना चाहती थी, लेकिन श्रद्धालुओं के बीच से आतंकियों को निकालना बेहद मुश्किल था, इसमें श्रद्धालुओं की जान को भी खतरा था।

05 जून 1984
माहौल बिगड़ता देख कमांडिंग ऑफिसर मेजर जनरल ‘कुलदीप सिंह बरार’ ने शाम को अपने कमांडोज़ को मंदिर में प्रवेश करने का आदेश दिया, लेकिन आतंकियों ने उन पर अंधाधुंध फायरिंग कर दी। अब ये आंदोलन युद्ध का रूप ले चुका था। हमले में सेना के 20 से अधिक जवान शहीद हो गए। मजबूरी में सेना को टैंक का इस्तेमाल करना पड़ा। इसी के साथ सेना आगे बढ़ी।

06 जून 1984
अल-सुबह हुए जोरदार धमाके में अकाल तख्त को काफी नुकसान हुआ। ये दमाका इतना जोरदार था कि अकाल तख्त में जरनैल सिंह भिंडरावाले, उसका सहयोगी जनरल शाहबेग सिंह और उसके लगभग 40 साथी मृत पाए गए। सके पश्चात् करीब 200 आतंकियों ने समर्पण कर दिया। इस तरह गोल्डन टेंपल आतंकियों से आज़ाद हो गया। लेकिन ये आज़ादी कई लोगों की लाशों पर मिली थी जिनमें कई बेकसूर लोग भी शामिल थे।

इस जीत से दुखी थीं इंदिरा गांधी

कहा जाता है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को यह पता नहीं था ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ में लोगों की मौत भी होगी, उन्हें लगा ता की शांतिपुर्ण तरीके से आतंकियों को सरेंडर करा दिया जाएगा। दरअसल उन्हें ऑपरेशन से पहले तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल ‘अरुण कुमार वैद्य’ ने कहा था कि गोल्डन टैम्पल में कोई मौत नहीं होगी और न ही कोई घायल होगा। इसी के चलते इंदिरा गांधी ने इस ऑपरेशन की इजाजत दी थी।

दरअसल तत्कालीन रक्षा राज्यमंत्री ‘के.पी. सिंहदेव’ चाहते थे कि तुरंत इंदिरा गांधी तक यह संदेश पहुंचा दिया जाए की ऑपरेशन कामयाब रहा, लेकिन बड़ी संख्या में सैनिक और आम लोग मारे गए हैं। लेकिन खबर मिलते ही इंदिरा गांधी की पहली प्रतिक्रिया दुख भरी थी। उन्होंने यह सुनते ही कहा, ‘‘हे भगवान, इन लोगों ने तो मुझे बताया था कि कोई हताहत नहीं होगा।’’ इस ऑपरेशन के सफल होने से भी इंदिरा गांधी बेहद दुखी, क्योंकि वो कतई नहीं चाहती थी के जन हानी हो, उनका मकसद तो समर्पण करवाना था।

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