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ऐसा गांव जहां पुरुषों का आना है सख्त मना

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Written by Rahul Ashiwal

किसी भी व्यक्ति को अपना अकेलापन दूर करने के लिए एक साथी की जरुरत हमेशा रहती ही है फिर चाहे वो स्त्री हो या फिर पुरुष। कभी न कभी उसे इस कमी को पूरा करने के लिए ऐसे जीवनसाथी की जरुरत होती है जिसके साथ वह अपना पूरा जीवन व्यतीत कर सके। खेर छोड़ो यह तो थी साथ रहने की बात लेकिन क्या आपने कभी अपने आस पास  ऐसी स्त्री को देखा है जिसे पुरुषो से सख्त नफरत हो?

अगर देखा भी होगा तो मुश्किल से एक या दो इससे ज्यादा नहीं लेकिन आज हम  आपको जो अफसाना सुनाने जा रहे है वह एक ऐसे गांव का है जहां सिर्फ और सिर्फ महिलाएं रहती है , एक मात्र पुरुष की परछाई भी उस गांव में नहीं है। एक ऐसा गांव जहां पुरुषो का आना सख्त मना है। हर हालात में इस गाँव की महिलाएं खुद पर निर्भर रहती है न कि किसी पुरुष पर।  आइये बताते है आपको कि आखिर ऐसा क्यों है ?

गांव की स्थापना

हम जिस गांव के बारे में आपको बता रहे है वह उत्तरी केन्या से कोसों दूर स्थित दुर्लभ सम्बुरुलैंड पर बसा ‘उमोजा’ नामक  गांव है । लगभग 25 साल पहले यानि वर्ष 1990 में रेबेका नामक महिला ने इस गांव को बसाया था। यह गांव उन महिलाओं के लिए एक आश्रय रहा जो अपने विवाहिक जीवन में बलात्कार, हिंसा और युवावस्था में बड़े दर्द से गुजरी हैं। इस गांव में उन सभी महिलाओ का आना होता है जो या तो विधवा हो या अपने पति को लेकर किसी बहुत बड़ी परेशानी से जूझ रही हो।

वर्षों तक अपने पति के हाथ की कठपुतली बनी रहीं वे महिलाएं, जिन्हे जब चाहे उनके पति उनके साथ मार-पीट, हिंसा करते और जब चाहते उनके साथ जबरन संबंध बनाते। वे पुरुष अपनी पत्नी को बस एक ऐसी वस्तु समझते जिसके साथ कभी भी, किसी भी तरह का व्यवहार किया जा सकता था। पत्नी का सम्मान करना तो दूर उसे मात्र अपने पुरुषत्व को संतुष्ट करने का एक जरिया समझते थे। समाज चाहे कोई भी हो किसी में भी मैरिटल रेप की अवधारणा कुछ खास मायने नहीं रखती लेकिन वैश्विक स्तर पर हजारों स्त्रियां हर रात इस दंश को भोगती हैं। रेबेका भी इन्ही महिलाओ में से एक थी जिसके चलते उसने इस गांव को बसाया।

वर्जित है पुरुष का आना

इस गांव में सिर्फ और सिर्फ महिलाएं ही आ सकती है किसी भी पुरुष का यहां आना सख्त मना है। वह महिलाएं जो अपने पति के अत्याचारों से दुखी होकर इस गांव में आती तथा कभी भी अपने पति के पास वापस लौटकर जाना नहीं चाहती थी ,उन्होंने अपनी एक अलग कॉलोनी बसाई और सब की सब उसी स्थान पर निवास करने लगीं। यह वो स्थान है जहां किसी भी पुरुष का आना वर्जित है। यहां रहने वाली महिलाएं खुद कमाती हैं और खुद अपना जीवन बिताती हैं। इस गांव की महिलाये खुद पर निर्भर रहती है न कि किसी पुरुष पर।

स्थानीय पुरुषो के क्रोध का कारण है यह गांव

यह वो गांव है जहां कितनी भी महिलाएं, किसी भी समय रहने आ सकती हैं लेकिन कोई पुरुष इस गांव में कदम तक नहीं रख सकता। यह सब स्थानीय पुरुषों के क्रोध का कारण बन चुका है, वहां गांव के पास में रहने वाले स्थानीय पुरुष रेबेका को अपना दुश्मन समझते हैं और उसे धमकियां देते रहते हैं। लेकिन रेबेका इन सबसे हार मानकर बैठने वाली नहीं हैं। रेबेका का कहना है कि वह अपने जीवन के अंतिम सांस तक स्त्री खतने के विरुद्ध लड़ती रहेंगी और जो स्त्री इससे बचना चाहती है उसे आश्रय भी देंगी।

गांव में महिलाओ की भड़ती तादात

जबरन विवाह, मैरिटल रेप, खतना, पति या ससुराल द्वारा हिंसा, आदि जैसी घटनाओं से पीड़ित 15 महिलाओं के साथ इस गांव को बसाया गया था। लेकिन देखते ही देखते इनकी संख्या बढ़ती गई, आज इस गांव का अपना एक स्कूल और क्लीनिक है। यहां रहने वाली महिलाएं मोती की माला बनाकर और फिर उन्हें आने वाले पर्यटकों को बेचकर अपनी आजीविका कमाती हैं। इसके अलावा वे गांव के छोर पर कैंपसाइट बनाकर भी पर्यटकों को आश्रय देती हैं।

महिलाओं का कहना है कि पितृसत्तात्मक समाज होने की वजह से उन्हें हमेशा पति या पिता के अधीन ही समझा गया है। परंतु अब वे अपनी आजादी चाहती हैं और किसी भी प्रकार के अत्याचार को सहन करने के लिए तैयार नहीं हैं। भले ही इस गांव की महिलाओं को अपनी आजीविका कमाने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ता हो, भले ही इस संघर्ष के बावजूद उन्हें दो वक्त का खाना नसीब होता हो लेकिन फिर भी वे उमोजा में खुश हैं, क्योंकि यहां उनके साथ अत्याचार करने वाला कोई पुरुष नहीं है।

आजादी की सांस किसे नहीं भाती! जब इस आजादी पर पहरेदारी की जाए तो जहिर है कुछ भी करके व्यक्ति घुटन से बाहर निकलना चाहेगा। इस घुटन से बाहर निकलने के लिए शर्ते भी बहुत होती हैं परंतु एक सम्मानजनक जीवन से बड़ा रिवॉर्ड और कोई नहीं होता।

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