Life

इस मंदिर में चढ़ाई जाती है चप्पलों की माला

mm
Written by Rahul Ashiwal

मंदिर में जाकर आप लोग भी पूजा अर्चना कर के भगवान् पर फूलो की माला चढ़ाते हैं। लेकिन क्या अपने कभी सुना है कि एक ऐसा मंदिर जहां चप्पलो की माला चढ़ाई जाती है। आप भी यह सुनकर सोच रहे होंगे कि यह कैसा अंधविश्वास है जहाँ मंदिर में ही लोग चप्पलो की माला चढ़ाते हैं? देखा जाए तो मंदिर में चप्पल भी मंदिर से बाहर उतार कर जाना पड़ता है। जिस मंदिर के बारे में आज हम आपको बताने जा रहे है वहां भक्त देवी मां को खुश करने के लिए चप्पलों की माला चढ़ाते हैं। आइये बताते है आपको इस मंदिर की परम्परा के बारे में।

क्या है माजरा 

सभी धर्मो के लोगो की अपनी अलग अलग परम्पराएं होती ही कुछ लोग किसी तरीके से अपनी आस्था प्रकट करते है तो कोई किसी तरीके से। कर्नाटक के गुलबर्ग जिले के गोला गांव स्थित एक मंदिर है जिसे लोग लकम्मा देवी मंदिर के नाम से जानते है। इस मंदिर में देवी माँ को प्रसन्न करने के लिए लोग चप्पलें चढ़ाते हैं। लोगो का मानना है कि इससे देवी माँ खुश हो जाती है। मंदिर के सामने एक नीम का पेड़ है जिसमें लोग चप्पल बांधते हैं और देवी से मुराद मांगते हैं। ईनाडु इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस मंदिर की एक और खासियत है। यहां मंदिर का पुजारी हिंदू नहीं बल्कि मुसलमान होता है। इस मंदिर में दिवाली के बाद आने पंचमी पर विशेष मेला भी लगता है। हर मंदिर के बाहर जहां प्रसाद की दुकान लगती हैं वहीं इस मंदिर के बाहर चप्पलों की दुकानें दिखाई देती हैं।

परंपरा के पीछे की मान्यता 

माना जाता है कि पंचमी के दिन मंदिर वाले भक्त अगर माता से मन्नत मांगते समय पेड़ पर चप्पल बांधते हैं और जिन लोगों की मान्यताएं पूरी हो जाती है वह मंदिर में आकर देवी को चप्पलों की माला चढ़ाते हैं। यह परंपरा बहुत पुरानी है जो काफी पुराने समयकाल से चली आ रही है।

मंदिर की कहानी

गांववालों का मानना है कि बहुत समय पहले की बात है एक बार देवी मां पहाड़ी पर टहल रही थी। उसी वक्त किसी अन्य गांव के देवता की नजर देवी पर पड़ी और उन्होंने उनका पीछा करना शुरू कर दिया। देवी ने उससे बचने के लिए अपने सिर को जमीन में धंसा लिया। देवी की उसी स्थिति की प्रतिमा उस मंदिर में स्थापित की गयी है और तब से लेकर आज तक माता की मूर्ति उसी तरह इस मंदिर में है और यहां लोग आज भी देवी के पीठ की पूजा करते हैं। लोगों का कहना है कि पहले मंदिर में बैलों की बलि दी जाती थी लेकिन जानवरों की बलि देने पर रोक लगने के बाद बलि देना बंद कर दिया गया। माना जाता है कि मंदिर में जब बलि देना बंद हो गया तो इसके चलते देवी मां क्रोधित हो गई और उन्हें शांत किया गया। और उन्हें शांत करने के लिए बाद में बलि के बदले चप्पल चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई।

फुटवियर का लगता है मेला

इस गांव की एक ख़ास परंपरा और भी है , दिवाली के बाद पंचमी के दिन इस मंदिर में खास मेला लगता है जो पिछले साल 6 नवंबर को था। इस दिन मंदिर में फुटवियर फेस्टिवल का आयोजन होता है जिसमें देशभर से हजारों लोग पहुंचे और माता के दर्शन करने के साथ ही पेड़ पर चप्पलों को भी बांधा। मंदिर में चप्पल बांधने की परंपरा जरा हटके जरूर है लेकिन इस गांव में लोगो की श्रद्धा और आस्था इतनी ज्यादा है कि बाहर से आने वाला हर व्यक्ति इस चीज को देखकर अचंभित हो जाता है।

About the author

mm

Rahul Ashiwal

Leave a Comment