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यहां ज़िन्दा इंसानों की तरह रहते हैं मुर्दा शरीर 

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Written by Shweta Singh

भारत वर्ष में ही नहीं इस पूरे संसार में कई ऐसी जनजातियां हैं जिनके रीति रिवाज अनोखे और सबसे जुदा होते हैं. आज हम आपको ऐसे ही समुदाय की अनोखी दुनिया में लिए चलते हैं जहां के रीति रिवाज़ आपको चौंका देंगे.

इंडोनेशिया का है यह समुदाय

तो चलिए आपको लिए चलते हैं इंडोनेशिया के एक ऐसे समुदाय के यहां जो अपने घर में मुर्दों के साथ रहते हैं. जी सही पढ़ा आपने, इंडोनेशिया के दक्षिण सुलावेसी द्वीप पर तोराजा समुदाय के लोग रहते है. ये लोग अपने परिवार के मृत व्यक्ति के शरीर को अपने घर में ही जीवित सदस्य के तौर पर रखते हैं.

क्या है इसे पीछे का कारण

दरअसल ऐसा करने की पीछे एक बड़ी वजह है. अंतिम क्रिया के दौरान तोराजा समुदाय में कई पशुओं की बलि देकर पूरे समाज को दावत देनी होती है और यह दावत कई दिनों तक चलती है. आप इसे इस तरह समझ सकते हैं की इस रीती में इंडोनेशिया के एम्प्लोयी को मिलने वाली सालाना एवरेज सैलरी से भी कई गुना खर्च हो जाता है. यानि इस समुदाय में होने वाला अंतिम संस्कार काफी खर्चीला होता है. इसी वजह से जब तक वेह अंतिम संस्कार के लिए पैसे नहीं जोड़ लेते तब तक परिवार मृत सदस्य को अपने साथ ही रखता है.

जीवित व्यक्ति की तरह ही करते हैं व्यवहार 

तोराजा समुदाय के लोगों के इस रिवाज के कारण परिवार वाले मृत शरीर से जीवित व्यक्ति की तरह ही व्यवहार करते हैं. हमेशा की तरह रोज़ नियम से उसके लिए खाना-पानी, कपड़े, साफ-सफाई, यहां तक कि सिगरेट वगैरह का इंतजाम भी किया जाता है. आपसी बातचीत में भी उसके लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग करते हों, मानो वे जिंदा है और बस बीमार है.

शरीर को ख़राब होने से कैसे बचाते हैं

इंडोनेशिया के दक्षिणी सुलावेसी द्वीप पर रहने वाली तोराजा कम्युनिटी में यह एक आम रिवाज है. वे लोग शव को दफनाए जाने से पहले घर में ही रखते हैं. इस दौरान मुर्दे के भीतर इंजेक्शन से फार्मेलिन रसायन डाला जाता है, ताकि वह सड़े नहीं.  इतना ही नहीं उसे ताबूत में लिटाकर घर के भीतर ही रखा जाता है. उसके लिए बाकायदा खाना, नाश्ता, पानी आदि का इंतजाम होता है. रोज उसके कपड़े बदले जाते हैं, रात को ढीले कपड़े पहनाए जाते हैं. इस दौरान परिवार के सदस्य दैनिक व्यवहार और बातचीत में मृत सदस्य को जीवित की तरह ही व्यवहार करते हैं.

स्थानीय भाषा में इस रिवाज को माएने कहा जाता है, जिसका मतलब होता है, शवों को साफ करने का समारोह. इस दौरान बुजुर्गों ही नहीं, बच्चों के शवों को भी बाहर निकाला जाता है. शवों को कब्रों से निकालकर वहां ले जाया जाता है, जहां व्यक्ति की मौत हुई थी, फिर उसे गांव लाया जाता है. गांव तक लाने के दौरान सीधी रेखा में चला जाता है. इस दौरान मुडऩा या घूमना वर्जित होता है.

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