भारत में भी है चीन जैसी लम्बी दीवार

 

दुनिया की सबसे लम्बी दीवार की बात होती है हमारे ज़ेहन में सबसे पहला और आखिरी नाम ग्रेट वाल ऑफ़ चाइना का ही आता है. लेकिन अब भारत में भी ऐसी ही एक दीवार का ज़िक्र हुआ है जो कि लगभग हज़ार वर्ष पुरानी बताई जा रही है.

 

कहां है यह दीवार

आपके मन में भी ये उत्सुकता होगी कि ग्रेट वाल ऑफ़ चाइना के बाद अब भारत में यह दीवार कहां  से आ गयी और आई भी तो इसे किसने बनाया. तो चलिए यहाँ हम सस्पेंस खोल ही देते हैं. दरअसल ये दीवार मध्य प्रदेश राज्य की राजधानी भोपाल से करीब दो सौ किलोमीटर दूर रायसेन जिले में स्थित है. हालांकि एक नजर में देखने पर ये दीवार जैसी नजर नहीं आती क्योंकि ये जमीन के भीतर धंसी हुयी है. जानकारी के मुताबिक अस्सी किलोमीटर से भी लम्बी है यह दीवार. यह दीवार रायसेन जिला के उदयपुरा गाँव से सटे जंगले से शुरू होती हुई भोपाल से सौ किलोमीटर दूर बाड़ी बरेली के चौकीगढ़ किले तक जाती है.

दसवी सदी में बनी है ये दीवार

पुरातत्वविद डॉ. नारायण व्यास के मुताबिक, विंध्याचल पर्वत श्रृंखला की पहाड़ियों पर घने जंगलों के बीच यह दीवार दसवी से ग्याहरवीं सदी के बीच परमार कालीन राजाओं द्वारा बनवाई गई है और इस दीवार की बनावट से भी यही अंदाज लगाया जा रहा है की इसे परमार कालीन राज्य की सुरक्षा की दृष्टि से बनवाया गया था. यह कई जगह से टूटी है, फिर भी इसकी ऊंचाई पंद्रह से अट्ठारह फीट और चौड़ाई दस से पंद्रह फीट है। कुछ जगह इसकी चौड़ाई चौबीस फीट तक है।

 

क्यों बनवाई गई होगी दीवार

डॉ. नारायण व्यास के मुताबिक, परमार वंश के राजाओं ने यह दीवार अपने राज्य की सुरक्षा के लिए बनवाई होगी. गोरखपुर गांव से आगे नरसिंहपुर और जबलपुर पड़ता है, जो दसवीं और ग्याहरवी सदी में कल्चुरी शासकों के अंतर्गत आता था. बता दें कि परमार और कल्चुरी शासकों में आपस में युद्ध हुआ करते थे. कल्चुरी शासकों के हमलों से बचने के लिए ही शायद इतनी ऊंची दीवार बनाई गई हो. यह तो सभी जानते हैं कि दूसरी शताब्दी में चीन के पहले सम्राट किन शी हुआंग ने भी चीन की दीवार का निर्माण विदेशी हमलों से मिंग वंश को बचाने के लिए किया था.

कैसी है दीवार की बनावट

इस दीवार को देखने से पता चलता है कि इसे बनाने में लाल बलुआ पत्थर की बड़ी चट्टानों का इस्तेमाल किया है. इसके दोनों ओर विशाल चौकोर पत्थर लगाए गए हैं. पत्थरों की इंटरलॉकिंग के लिए हर पत्थर में त्रिकोण आकार के गहरे खांचे बने हुए हैं. इसलिए जुड़ाई में चूना, गारा आदि का इस्तेमाल नहीं किया गया है. हालांकि, दीवार के बीच में पत्थर के टुकड़े, मिट्टी और कंकड़ का भराव किया गया है. कहीं-कहीं पत्थरों को जोड़ने के लिए लोहे के डावेल्स का भी इस्तेमाल किया गया है. गोरखपुर गांव से आठ कलोमीटर दूर मोघा डैम पर इस दीवार का काफी हिस्सा अभी भी सुरक्षित है.

स्थानीय लोगों की राय

मध्य भारत भारतीय इतिहास संकलन समिति के सदस्य विनोद तिवारी ने बताया कि दीवार के लिए उन्होंने कई प्रशासन से मदद मांगी और बेशकीमती मूर्तियों के चोरी होने की जानकारी भी दी, लेकिन अभी तक कोई देखरेख की व्यवस्था नहीं की है.  इसके बाबत पुरातत्व विभाग से भी अनुरोध किया था कि इस ऐतिहासिक धरोहर को सहेजने की दिशा में काम किया जाए. प्रशासन चाहे तो यह स्थान एक पर्यटन स्थल के तौर पर विकसित किया जा सकता है.

भारत सरकार साइट को करेगी टेक ओवर

केंद्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा के अनुसार वे इस साईट का मुआयना आर्कियोलॉजी सर्वे ऑफ़ इंडिया से करवाएंगे. भारत सरकार इस एतिहासिक दीवार को तत्काल टेक ओवर कर इसकी खुदाई करवाई जाएगी। उन्होंने आगे कहा कि इस साइट के बारे में और जानकारी लेकर जल्द से जल्द आदेश जारी किया जायेगा. वहीं राज्य मंत्री सुरेन्द्र पटवा का कहना है की इस साईट को पर्यटन केंद्र बनाने के लिए उनसे जितना बन पड़ेगा वे करेंगे.

ये बहुत महत्वपूर्ण खोज है। चाइना वॉल के बाद इतिहास  की इतनी महत्वपूर्ण धरोहर मिली है जो कि मध्यप्रदेश ही नहीं पूरे भारत के लिए गौरव की बात है. यहाँ के कलेक्टर ने भी जल्द से जल्द इसका प्रारंभिक सर्वे कर इसकी थ्रीडी मैपिंग कराने की बात की है जिससे इस दीवार की वास्तविक लम्बाई ज्ञात हो सके. कलेक्टर साहब का यह भी कहना है कि यह पुरातत्व की तकनीक से जुड़ा मामला है, इसलिए इसके संरक्षण और डाक्युमेंटशन के लिए पुरातत्व विभाग को प्रस्ताव भेजा जायेगा, ताकि यह और बेहतर तरह से लोगों के सामने आ सके.

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