आइये चलते हैं नागों की दुनिया में

 

नाग या सांप का नाम सुनते ही शरीर में सिरहन सी होने लगती है. वैसे भी नागकथा लोगों को रोमांचित करती है और ऐसी ही कई दिलचस्प कहानियां सुनने में लोगों की रूचि होती है. जहरीला और आकर्षक जीव होने की वजह से, यह रिसर्च और वाइल्डलाइफ में दिलचस्पी लेने वालों का भी ध्यान अपनीओर आकर्षित करता है. जिस तरह वन्य जीव पार्क पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं ठीक वैसे ही सांप की विशेष जातियां भी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं.

साँपों की न जाने कितनी प्रजातियाँ ऐसी हैं जो विलुप्त होती जा रही हैं. इसी क्रम में वन्यजीव के ऐसे ही कई संगठन है जिनकी वजह से सांपों की कई विभिन्न जातियों का संरक्षण करने की कोशिश की जा रही है. तो चलिए आज हम आपको भारत के कुछ ऐसे ही सांप उद्यानों के बारे में बताते हैं जिसमे साँपों का संरक्षण किया जा रहा है.

 

गिनडी स्नेक पार्क, चेन्नई

गिनडी स्नेक पार्क या चेन्नई स्नेक पार्क संगठन, भारत का सबसे पहला सरिसृप पार्क है, जो सन् १९७२ में स्थापित किया गया था. यह सर्प उद्यान भारत के ही कई सांपों की प्रजातियों के साथ-साथ विदेशी प्रजातियों का भी वास स्थल है. गिनडी स्नेक पार्क सांपों के प्रजनन और अनुसंधान का भी केंद्र है, जिसे प्रसिद्ध सरिसर्प वैज्ञानिक रॉम्युलस वाइटेकर द्वारा स्थापित किया गया था.

बान्नेरघाटा स्नेक पार्क, बेंगलूरु 

बान्नेरघाटा स्नेक पार्क, बेंगलुरू के बान्नेरघाटा नेशनल पार्क का ही एक हिस्सा है. यह पर्यटकों के बीच मुख्य आकर्षणों में से एक है. यह स्नेक पार्क कई आकर्षक जातियों के साथ लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता है. बान्नेरघाटा स्नेक पार्क को भारत के प्रमुख सर्प उद्यानों में से एक भी कहा जाता है.

स्नेक पार्क, कोलकाता 

कोलकाता का स्नेक पार्क पूर्वी भारत का सबसे पहला स्नेक पार्क है. कोलकाता का यह स्नेक पार्क दो  एकड़ के घने जंगलों में फैला हुआ है, जो जगह सांपों के संरक्षण के लिए सबसे अच्छी जगह है. सर्पों के अलावा यह कई स्तनधरियों, सरीसृपों और पक्षी की जातियों भी देखने को मील जायेंगी

परिस्सिनिकदावु स्नेक पार्क, कन्नूर

परिस्सिनिकदावु, मुथप्पन मंदिर के साथ-साथ वहां के स्नेक पार्क के लिए भी फेमस है.परिस्सिनिकदावु स्नेक पार्क कई सारे विषैले और निर्जीविष सांपों की प्रजातियों के लिए प्रसिद्ध है, जो कुन्नूर में आए पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हैं.

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