जब राम के बन्दे ने रहीम को पूजा

गोरखपुर के लाल बाबू के घर में जिस तरह होली दीपावली में उत्साह का माहौल होता है ठीक वैसा ही उत्साह उनके यहां चांद रात और ईद के लिए भी होता है. शहर के जगन्नाथपुर इलाके का ह परिवार सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल है और इसके मुखिया लाल बाबू कौमी एकता की विरासत को पिछले तीस सालों से जिंदा रखे हुए है.

काबी शुरू किया यह सिलसिला
लाल बाबू बताते हैं की 1950 की बात है जब उनके पिता स्वर्गीय गंगा बाबु ने परिवार के भरण पोषण के लिए रमज़ान में एक दुकान की मन्नत मांगी और तय किया कि अगर दुकान हो गई तो वह हर रमजान में दस रोजे रखेंगे। मन्नत पूरी हुई तो उन्होंने रमजान में रोजे रखने शुरू कर दिए.उनका यह सिलसिला 1985 तक चला. 1986 में उनका देहांत हुआ तो उनके बेटे लाल बाबू ने पिता की मन्नत सिर-माथे पर ले ली.

पूरे के परिवार का है समर्थन

पिता की विरासत को आगे बढ़ाते हुए व्यापारी लाल बाबू पिछले तीस साल से रोजा रखते आ रहे हैं. रखें भी क्यों न… गंगा-जमुनी तहजीब की विरासत उन्हें अपने पिता से जो मिली है. लाल बाबू के रोजे में परिवार पूरा साथ देता है। पत्नी गीतांजलि सहरी और इफ्तारी की तैयारी करती हैं तो बेटा करन, बेटी सदाक्षी और आराध्या दस्तरख्वान पर लाल बाबू का साथ देते हैं. ईद वाले दिन ईद की सेवैयां खाने पूरा मोहल्ला इनके घर में इकठ्ठा हो जाता है और भाईचारे की अनूठी मिसाल यहां देखने को मिलती है.

 

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