यहां शिक्षक छूते हैं बच्चों के पैर

“गुरु गोबिंद दोउ खड़े काके लागूं पाएं

बलिहारी गुरु आपे गोविन्द दियो बताये”

कबीर के उपरोक्त दोहे से यह तो स्पष्ट हो ही गया होगा कि हमें गुरु के श्रीचरणों में झुकना चाहिए जिसकी कृपा से हमें ईश्वर को समझने और उनके दर्शन का मौका मिला.  बुजुर्गों के पैर छूने को सम्मान देने का प्रतीक माना जाता है, जिसके बदले में पैर छूने वाले को आर्शीवाद मिलता है. प्राचीन काल से अपने देश में गुरुओं को भगवान से भी ऊंचा दर्जा दिया गया है. इसी कारण से गुरु के पैर छूकर उनसे आर्शीवाद लेने की परंपरा बनी हुई है. लेकिन एक ऐसा स्कूल है जहां परंपरा इसके उलट है.

कहां है यह स्कूल
यह स्कूल स्थित है मुंबई में जहां बिल्कुल विपरीत होता है. यहां उल्टा, शिक्षक अपने छात्रों के पैर छूते हैं. सुनने में थोडा अजीब लगेगा लेकिन हर सुबह एक परंपरा के चलते इस स्कूल में यह नज़ारा आम है.

क्या है इस स्कूल का नाम

मुंबई में स्थित ऋषिकुल गुरुकुल विद्यालय में बच्चों को भगवान का रूप माना जाता है, इसलिए उनके पैर छूना भगवान के समक्ष झुकने के समान माना जाता है. गुरुकुल में चल रहे इस क्रम से शिक्षकों के प्रति भी सम्मान की भावना बढ़ गई है. शिक्षक भी यहां बच्चों से आर्शीवाद मांगते हैं.

क्या मानना है शिक्षकों का

ऋषिकुल गुरुकुल के शिक्षकों का मानना है कि ऐसा करने से अन्य छात्रों को भी प्रेरणा मिलेगी कि हमउम्रों का सम्मान करना चाहिए. यह स्कूल घाटकोपर में संचालित होता है, जो कि महाराष्ट्र राज्य सेकंडरी बोर्ड से जुड़ा है.

सामान्य होते हुए भी खास है यह विद्यालय

ये बहुत बड़ा स्कूल नहीं है और एक किराये पर ली गयी बिल्डिंग में इसे चलाया जा रहा है. इस स्कूल में टीचिंग के नए-नए तरीके आजमा कर बच्चों को पढ़ाया जाता है. यूं तो ये एक सामान्य स्कूल है, लेकिन यहां जो संस्कार बच्चों को दिए जाते हैं, वो इसे खास बनाते हैं.

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